कवि: संदीप तिवारी
(संदीप कै कविताई की जमीन अवध कै किसानी जनजीवन केर बानगी है। ई अवधिया ज्वान कविता का वहे सहजता ते रचत है जैसे एकु किसान दुख औ संघर्षन के बीच परबी मनावत होय। यह उत्सवधर्मिता हमरे गंवई लोक जीवन कै अमानत है। गरीबी, जहालति, सत्तानसीनन कै ठगई, असमानता, असिच्छा, धार्मिक उदंडता ते विकृत समाज से उबियान संदीप की कविता अपने समय मा बच्ची खुची हरेरी तलास करत दिखाई परत है। इन कवितन मा वर्ग संघर्ष के नए आयाम दिखाई देत हैं। बहुत सहज बिम्ब हैं लेकिन उनकी सामाजिकी बहुत गहन। किसानी जीवन कै समसामयिक समस्यन से टकराती हैं कबिता और फेरि स्मृति ते ताकत लै के कवि बदरा जस पियासी धरती पर बरसे बदि उमंगि परत है। संदीप की कविता पढ़ि के मन सिहाय जात है। -संपादक)
1-
भितरी क मार दहिजरु जानैं !
बड़ा बड़कवा बहकैं जब तौ
चुप मारौ औ पसरौ
छंद छछन्द करैं जब मिलिकै
सुर्ती चूना घसरौ
चुप मारौ औ पसरौ
छंद छछन्द करैं जब मिलिकै
सुर्ती चूना घसरौ
गाय दुवारे बान्हे अइसन
कामधेनु जस मानैं
दूध देय बस एक गिलासी
दुहै से पहिले छानैं
भितरी क मार दहिजरु जानैं !
कामधेनु जस मानैं
दूध देय बस एक गिलासी
दुहै से पहिले छानैं
भितरी क मार दहिजरु जानैं !
2-
बरसि गए बदरा बेमौसम
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
दिन मा किए अनिहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
बरसि गए बदरा बेमौसम
दिन मा किए अनिहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
अखियाँ म जैसय लगाए कजरवा
चमकैं औ गरजैं चिढ़ावैं बदरवा
रोवैं औ पनिया बहावैं बदरवा
ताकैं तौ जैसै डरावैं बदरवा
करिया भई दुपहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
चमकैं औ गरजैं चिढ़ावैं बदरवा
रोवैं औ पनिया बहावैं बदरवा
ताकैं तौ जैसै डरावैं बदरवा
करिया भई दुपहरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
उड़ि चली चिरई
कुकुर सब भागैं
नाचै बच्छउआ
पड़ीवा कुलाछै
ताकैं टुकुर टुकुर सरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
कुकुर सब भागैं
नाचै बच्छउआ
पड़ीवा कुलाछै
ताकैं टुकुर टुकुर सरिया
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
गोहूँ वलरि गए
टूटि गई सरसो
झरे गिरे चनवन कै फुलवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
टूटि गई सरसो
झरे गिरे चनवन कै फुलवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
होली मा बरसैं
देवाली मा बरसैं
तरसैं असाढ़े मा धनवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
देवाली मा बरसैं
तरसैं असाढ़े मा धनवा
बरसि गए बदरा बेमौसम
नहकै तुराय लिए पगहा
बरसि गए बदरा बेमौसम
3-
केतनी छींक भई कविताई
कैसे गाई अउर सुनाई
हालत बहुतै डाँवाडोल
कविता करन लगे बकलोल
4-
बरसै उमड़ घुमड़ घनघोर
बरसै उमड़ घुमड़ घनघोर
रजवा पिहुंकै जैसे मोर
किला में बैठे बड़ बड़ चोर
दुइ दिन हल्ला दुइ दिन शोर
रजवा छोड़ि कै आपन रानी
भोकरै अलगै राम कहानी
खाली आपन मनमानी
रजवा लूटै आँख के पानी
रजवा परजा कै नसि जानै
रजवा धन्वंतरि कै पूत
रजवा अइसन नस दबावै
परजा कूदै छः छः फूट
गइया लागय न हमार
बन्द गोरु कै व्यापार
बछवा कूदै दस दुवार
होय सोंटा से सत्कार
अइसन हाल बा हमार
कुरसी केतना दिन रही
जनता केतना दिन सही
बरसै उमड़ घुमड़ घनघोर
रजवा पिंहुकै जैसै मोर
5-
दलिया म दुइ ठू खटाई लिखब हम
सिंचाई से ज्यादा दवाई लिखब हम
टेक्टर कै बढ़िया जोताई लिखब हम
भले होय घाटा फसलिया में सगरो
धाने कै निम्मन कटाई लिखब हम
गिरय लार ताकैं दुकनिया के आगे
तौ लड़िकन कै चकचक मिठाई लिखब हम
जे इस्कूले भागैं सिरिफ खाय ख़ातिर
ऊ नयिकी पढ़ाई-लिखाई लिखब हम
रगरि के खटावैं जे खेतवा में अपने
मजूरी के उनके कटाई लिखब हम
दही दूध माठा मलाई लिखब हम
औ दलिया म दुइ ठू खटाई लिखब हम
पतोहू कै नक्शा ससुर कै सिधाई
ससुइया कै घर मा ढिठाई लिखब हम
6-
बाटै बरम फुरात
कहो फलाने नया काव भै
सब तौ उहय पुरानै बा
दौड़ भाग मा आकुल व्याकुल
पगहा छान तुरानै बा
गोहूँ सब बेकार होइ गवा
गन्ना बाय झुरात
जेस जेस कर्जा बढ़त जात बा
मुडवा बाय पिरात
जरत बरत बा खेती बारी
बाटै बरम फुरात
सब जांगर बेकार होइ गवा
सारी नोटिया सिक्का होइ गय
कटत खटत जिउ हुक्का होइ गय
छांहीं म कइउ बिलुक्का होइ गय
7-
ठंड बढ़ी बा
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लल्लू के माई
आग जलाई?
पैरा लाई?
ठण्ड बढ़ी ब
हाथ गोड़ कुछ सेंका जाय
दउरि कै जात्यू
खैनी लवतू
एक एक बीरा ठोंका जाय
हुर-हुर-हुर-हुर बहय बयरिया
कइसय ओका रोका जाय??
लल्लू के माई
ठंड बढ़ी बा
लावा पैरा झोंका जाय
लल्लू के माई
तनकी लवतू दिया सलाई
थैली म हमरे पड़ी ब बीड़ी
एक-एक बीड़ी फूँका जाय
भात पुरहरे बना सुबेरे
बचा बा अबहीं
धनिया लहसुन पीस-पास के
जल्दी जल्दी खावा जाय
गीत गौनई गावा जाय
मिट्ठू के माई
ठण्ड बढ़ी बा
दिल कै हाल सुनावा जाय
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8-
अरे! भारत माता
पन्द्रह अगस्त के दिन अबकी
हम लड्डू फड्डू न खाबै
हम इस्कूले मा न जाबै
हम नाटक वाटक न खेलब
हम गीत गौनई न झेलब
जय भारत माता न बोलब
हम बोलि न पाउब आज़ादी
मुँह खोलि न पाउब आज़ादी
हम न घूमब झंडा लै के
हम न घूमब डंडा लै के
हम न घूमब झंडा लै के
हम न घूमब डंडा लै के
हम न गाउब अब राष्ट्रगान औ राष्ट्रगीत
बुझि गवा दिया हमरे घर कै
हम परे परे चिल्लात रहब
कुछ घास फूस हम खात रहब
हम पानी पाथर झेलि लेब
फट गई भीत हमरे घर कै
हम न घूमब झंडा लै के
हम न घूमब डंडा लै के
ई लालकिला की नौटंकी
औ जन गण मन हम जानित है
भारत का भाग्य विधाता है
तू कहत चला हम मानित है
मरि गए सैकड़ों पूत सुनौ भारत माता
ई नेता हैं अवधूत सुनौ भारत माता
बोली में इनके ज़हर घुला औ कहत हए
बाँके हैं और सपूत! सुनौ भारत माता
देखौ इनकी करतूत! अरे भारत माता
हम न घूमब झंडा लै के
हम न घूमब डंडा लै के
©संदीप तिवारी
संपर्क : ईमेल- sandeepmuir93gmail.com

सन्दीप सुंदर लिखिन हयं। ओनका बधाई। खूब लिखयं वय
जवाब देंहटाएंसुन्दर लिखिन हयं। बधाई संदीप।
जवाब देंहटाएंकविताएँ खिलखिला कर हँसना चाह रही हैं पर ऐसा कर नहीं पा रही हैं।ठहर-ठहर कर बतिया रही हैं गाँव जवार की हालत पर।किसानों की दशा पर।भावुक भी हो रही हैं।
जवाब देंहटाएंअवधी को समृद्ध करती कविताएँ।बधाई!
गजब कय लिखाई
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