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सोमवार, 13 जुलाई 2015

रामशंकर वर्मा की अवधी कविताएं







रामशंकर वर्मा हमारी समकालीन अवधी कविता के एक ऐसे महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी काव्य परंपरा बलभद्र दीक्षित 'पढ़ीस', वंशीधर शुक्ल और चंद्रभूषण त्रिवेदी 'रमई काका' से जमीनी स्तर पर जुड़ती है । वह कविता को जीवन की स्वाभाविकता के साथ  भाषा के चरित्र को पहचानने वाले कवि हैं । उन्होंने अपने लोक की स्थानीयता को अनुभूति की कोमलता में जिया है इसका प्रमाण हैं ये कवितायें । समय के बदलाव को समाज की विसंगतियों के साथ राजनीति ने जो अपनाया है उस पर बड़ी गंभीरता के चिह्न इस तरह का लोक कवि ही देख सकता है । इन कविताओं में जनपदीय अवधी का बड़ा सुंदर वितान है । आदरणीय रामशंकर जी ने ये कवितायें खरखइंचा ब्लॉग के लिए भेजा है , हम उनके हृदय से आभारी हैं !       





तुम भेड़हा हौ हम भेड़ी हन।


तुम भेड़हा हौ हम भेड़ी हन।

तुम लुके छिपौ आबादी ते
हम निर्भय अन्ना चरा करी।
तुम हउला डॉंगर मारि भरौ
हम दुइ पाती ते पेटु भरी।
तुम गाजर घास कनाडा कै
औ हम ख्यातन कै खेड़ी हन।

तुम पिज्जा बर्गर चाउमीन
हम गुड़धनिया बाटी च्वाखा
तुम्हरी गंगा कै किरिया पर
हम पॉंच साल खाई ध्वाखा।
तुम लकालक्कु हौ राजमार्ग
औ हम गोइडें कै मेड़ी हन।

तुम खादि यूरिया डीएपी
हम सरी पॉंसि घूरे वाली
तुम्हरे बटुअन के बदहजमी
हमरी थैली फटही खाली
तुम यूकीलिप्टस सर्र्रउवा
औ हम बरगद कै पेड़ी हन।

तुम माछी हौ हम भुनगा हन
तुम सरपट हौ हम ढ़नगा हन
तुम पहुॅंच्यौ यार चन्दरमा पर
कब ते खजूर पर बिलॅंगे हम।
तुम भयो जमानति नेता कै
हम चना च्वार कै बेड़ी हन।


न घर मा पिलवा अस कुकुहाव

न घर मा पिलवा अस कुकुहाव
भूकि कै बाहेर तिनुक देखाव।

सजन जी द्याखौ ऑंखि उघारि
नवा जुगु बैठि गवा चौपारि
मची चौगिर्दा चिल्लगोहारि
कलूटी बनिगे नीति बिलारि
छीनि कै तुमहूँ रोटी खाव।

धरौ हिन्दी कै लोटिया डोरि
सिखौ अंगरेजी हॅंसौ निपोरि
पियौ स्वारथ कै बूटी घोरि
अपनपौ गंगा जी मा बोरि
नात रित्तन ते पिंडु छोड़ाव।

किसानी छ्वाड़ौ ठेका लियौ
दूधु घिउ छ्वाड़ौ कोला पियौ
मथानी दुदहॅंडि़ का बनु दियौ
करै कोउ कुछौ मुला मुहु सियौ
पढ़ौ लरिकन का यहै पढ़ाव।



जब सार पजावै खॅंजड़ु है

हम इनकी चुपरी बातन का
दउवा कइसे बिस्वास करी।
जब सार पजावै खॅंजड़ु है
कस नीक दिनन कै आस करी।

मूड़े के बार हमारि सुनौ
न घामे मा भे हैं सनई
ई घेंघचुलि जइसी ऑंखिन ते
हम खुब पहिचानित है मनई
ई जउनि पॅंजेरा मा घूमति
बन्दूकै लइ के धमधूसर
इनके बप्पा परधान अहैं
जी जोति लिहिन परती ऊसर
सरकारी हन्ना मारि-मारि
मढ़वाइन सोने कै खॅंझरी।

मुलु यह तौ याक बानगी है
कुनबा का कुनबा नासी है
कोल्हू का बापु भवा जब ते
छोटकउना नेता कासी है
माथे मा गेरूआ तिलकु
जीभि ते बानी ब्वालै माहुर कै
हमहीं का वोट दिह्यौ न तो
यह धरती छोडि़ दियौ तुरतै
जोखू जुम्मन सुनि सकपकॉंय
अब होरी ईदि ककस सपरी।



वहै बढ़कउनू गॉंव हमार।

जहॉं बॅंदरवा झुलुआ झूलैं
पकरे मउहा क डार।
वहै बढ़कउनू गॉंव हमार।

पच्छे गड़ही म पढैं मिंझुकुरी
गिटिर पिटिर का पाठु
पुरबै तालु सिंघारन वाला
जेहिमा घोबिन घाटु
याक टॉंग पर करैं बकुलवा
मछरिन क्यार सिकार।

चौगिर्दा ऑंबन की बागै
बीच म जमुनी बेल
गूलर पीपर बॅंसवारिन म
ख्यालैं गिल्ली खेल
हुक्की हुआ करैं अधरतिया
चउकीदार सियार।

मनई का कहौ हियॉं की
चिरइउ कइ कै खॉंय
बया बनावे झ्वॉंझै लोखरी
मॉंदि खोदि सुस्तॉंय
करैं कमासुत हरू माची का
भोरहें रोजु सिंगार।

धनि माटी औ यहिके बेटवा
बना रहै सम्बन्धु
बनी रहै करमन कै खेती
लड़ै न कउनौ बन्धु
बनी रहै गुलझार हरेरी
हरहन का परिवार।

  
देवारी अइसे मनइबे।

सखी हियना मा
दियना जलइबे।
देवारी अइसे मनइबे।

अंतरे दुआरे म
स्वारथ का कूड़ा
देहरी क पोर-पोर
माया म बूड़ा।
बिद्या क बढ़नी बनइबे।

आसा क गगरा
उमंगन क कलसा
जीवन कै दीवटि औ
उत्सव का जलसा।
कविता कै माला चढ़इबे।

दुख की अॅंधेरिया ते
ऑंखी मटक्का
करिहैं उजेरिया के
गिन्नी पटक्का।
धीरज कै खंजड़ी बजइबै।

काया के दियना क
मलि-मलि धोइबै
सांसन का तेलु बरे
बिधिना मनइबे।
करमन कै बाती बनइबे।



वोटन कै रितु है जवानि

वोटन कै
रितु है जवानि।
बरसाती मिंझुका देखानि।

पॉंच साल बने रहे
गदहा की सींगै
हमरी डरैयन पर
मौजन की पींगै
धूरि रहेन हम पंचै छानि।

खेती के टुकड़ा भे
रोटी रूमाली
लरिका निरछर भे
अन्ना मवाली
घर कुरिया हमरी बिकानि।

फिरि हमते कइहैं कि
हम तुम्हरे बप्पा
खाय लियो वादन के
गोल गोल गप्पा
अकड़ आजु इनकै बिलानि।

हम इनकी नस नस ते
वाकिफ हैं भइया
खोलि-खोलि दुसरेन के
गोरू औ गइया
कोठी खड़ी सीना तानि।

हरियल अपनपौ
का सूखि गवा बिरवा
जाति धरम भासा का
लागि गवा किरवा
अकिल हवै हमरी हेरानि।




पिया देवर करै रॅंगबाजी


पिया देवर करै रॅंगबाजी
करौ यहिकै जल्दी ते सादी।

पोथी किताबन ते
परदा करत है
खेती किसानी न
पाले परति है
बना फिरै
मुरहन का काजी।

घड़ी घड़ी सीसा म
जुल्फै सॅंवारै
देहीं औ कपड़न म
खु्याबू दॅंवारै
सउखै करै नरगाजी।

वीवाली फिल्मैं
मोबाइल म द्याखै
का जानी भेजा म
का खिचड़ी पाकै
टुकुर टुकुर चितवैं
पिताजी।



अम्मा कुंवारू अब आवत है।

बातन के मीठि बतासा खुब
छोटकी बहुरिया बनावत है।
फुलियाय उठे कासा वन मा
अम्मा कुंवारू अब आवत है।

बरखा बूंदन के जूना ते
धरती अकास चमकाय दिहिसि।
चौगिर्दा दरी हरेरी कै
गुलगुलि गुलगुलि बिछवास दिहिस।
तितुलिन का दल चंकवड़ मइहॉं
अब हियॉं-हुवॉं मॅंडरावत है।

लइ मोगरी सूरज घामे कै
कथरी बदरै कै धुनि डारेसि।
चिरइन कै सेना उतरी है
सब सांवां काकुनि चुनि डारेसि।
चुनुवॉं गुल्याल की गोली ते
धानन के सुवा उड़ावत है।

भिनसारे औ संझलउखे अब
कछु ठंडी लागि बयारि बहै।
भै राति जोन्हइया ते जगमग
जो घटाटोप ते कारि रहै।
आवै वाली रितु परबन कै
यहु सोचि हिया हुलसावत है।













© रामशंकर वर्मा

पता-
    टी-3/21, वाल्मी कालोनी
    उतरेठिया, लखनऊ-226029
      मोब. -9415754892.












1 टिप्पणी:

  1. पढ़ना शुरू किया तो सबसे पहले 'तुम भेड़हा हौ हम भेंड़ी हन'पढ़ा।इसके बाद तो जब तक सारी कविताएं पढ़ नहीं लिया ,छटपटाहट -सी रही। इसमें प्रयुक्त अनूठी उपमाएँ जैसे हउला डॉंगर' गोइडें कै मेड़ी',' यूकीलिप्टस सर्र्रउवा', ' सरी पॉंसि' आदि कवि की उत्कृष्ट सर्जनात्मक दृष्टि का प्रमाण हैं। अपनेपन की सूखती हरियाली के लिए कवि का चिंतित होना उसके संवेदन होने की निशानी। "हरियल अपनपौ
    का सूखि गवा बिरवा
    जाति धरम भासा का
    लागि गवा किरवा
    अकिल हवै हमरी हेरानि।
    ' "तुम हउला डॉंगर मारि भरौ
    हम दुइ पाती ते पेटु भरी।"इसे भी कई बार पढ़ा। 'वहै बढ़कउनू गॉंव हमार','अम्मा कुंवारू अब आवत है','पिया देवर करै रॅंगबाजी','वोटन कै रितु है जवानि'देवारी अइसे मनइबे'और 'जब सार पजावै खॅंजड़ु है'। इन सब कविताओं मे कुछ न कुछ ऐसा नयापन है जो कवि को समकालीनता से जोड़ता है।अवधी कविता की आंचलिकता को देश व्यापी बनाता है।यह दृष्टि कवि रमाशंकर वर्मा को हिन्दी के उन समकालीन कवियों की श्रेणी मे खड़ा करतीहै,जिनमें उनकी लोकधर्मी चेतना मुखर होकर विद्रोह का बिगुल बजाती है।यह कवि का सामर्थ्य ही है कि मेहनत कस किसान के जीवन के मोगरी ,कथरी के बिंबों की सम्मोहक छटा के साथ क्वांर के महीने की कडक धूप का यथार्थ पाठक को अनायास किसी न किसी खेत मे ले जाकर खड़ा कर देता है। बरखा -बूँदों का जूना और फिर उससे आकाश का माँजना जैसे प्रयोग से शरद के आगमन की सूचना कवि को एक उत्कृष्ट ऋतु कवि बनाती है-"बरखा बूंदन के जूना ते
    धरती अकास चमकाय दिहिसि।
    चौगिर्दा दरी हरेरी कै
    गुलगुलि गुलगुलि बिछवास दिहिस।"
    और "लइ मोगरी सूरज घामे कै
    कथरी बदरै कै धुनि डारेसि।
    चिरइन कै सेना उतरी है
    सब सांवां काकुनि चुनि डारेसि।"
    इसके साथ ,"खेती के टुकड़ा भे
    रोटी रूमाली
    लरिका निरछर भे
    अन्ना मवाली
    घर कुरिया हमरी बिकानि।"लोकतन्त्र को मज़ाक बनाने और शोषण के कसाव बढ़ाने वाले कर्णधारों के चलते खेती के टुकड़ा के रूमाली रोटी मे रूपान्तरण जैसे अद्भुत बिंबों की सर्जना से कवि ग्रामीण जीवन के यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से रख पाने मे सफल हुआ है।भाषा की व्यंजना शक्ति अद्भुत है। शब्द-शब्द मे काव्य तत्त्व समाया है। सभी कविताएं बांधती हैं। -डॉ गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

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