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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

इन्द्रेश भदौरिया अवधी के मौजू कवि





इन्द्रेश भदौरिया अवधी के मौजू कवि हैं। इनकी कविता में अवधी की स्वाभाविक धार दिखाई देती है। सामाजिक परिवर्तन की ओर मुखरित इंद्रेश जी गँवईं मिजाज के लोक कवि हैं। इन कविताओं में उनके प्रगतिशील मूल्य हैं जो अवध के लोक चेतस मन में सामील हैं । उनकी कवितायें जड़ता का विरोध करती मानुषी वृत्ति की आकांक्षी हैं। आडंबरों को छांटने का काम एक लोक कवि के लिए जरूरी कर्म है। कुरीतियों का विरोध इन्देश जी की कविताओं में जोरदार है। अवधी की ये कवितायें आप खरखइंचा ब्लॉग पर पढ़ें और प्रतिक्रिया दें।             

          
बनाओ सुन्दर-सुघर समाज 

अरे तुम जेहिका कहत अछूत।
वहउ है ईश्वर क्यार सपूत।
वहू का माँस - खून है वहै।
जउन तुम्हरे चोला मा बहै।
अछूतन का काहे निदराव।
भेदु तुम हमका आजु बताव।
कमी है तुमका कउनि देखात।
छुओ ना तुम अछूत कर गात।
दूरि से तुम वहिते बतलाव।
मुला नहिं पास कबौ नियराव।
कहत नहिं यह पुरान औ बेद।
करउ मनई - मनई मा भेद।
बने तुम धरम के ठेकेदार।
करउ सब ओछेपन के कार।
अरथु तुम अइसा रहेव लगाय।
बड़ेन का ऊँचा रहेव बताय।
छोटकयेन का समुझत हौ नीच।
किहेव है बड़े - छोट मा बीच।
करायेव देउतन तक से बैर।
धरै नहिं हरिजन मन्दिर पैर।
बढ़ायो आपस मा तुम बैर।
समुझि के तुम अछूत का गैर।
दिहेव तुम मनई - मनई बाँटि।
लिहेव अपने हाथन का काटि।
मुला अब बदलउ आपनि रीति।
करौ सब जन अछूत से प्रीति।
लाव अपने मन मा बदलाव।
अछूतन का तुम गले लगाव।
मानिके उनका आपन अंग।
चलो सबका लइके निज संग।
तजौ अब जग के रीति रिवाज।
बनाओ सुन्दर - सुघर समाज।



          घनचक्कर

तुम मनई हौ या घनचक्कर ।
है भैराभुत्त बोखार चढ़ा,
है बकत बिटीवा अण्ट-सण्ट।
तुम कहत लागिगें नारसिंह,
गटई मा बाँधत घण्ट-पण्ट।
डाक्टर का नहीं देखाय रहेन,
नित आवत ओझा औ फकीर।
बीमारिउ बढ़तै जाय रही,तुम
पूँजि रहेव औलिया - पीर।
बिना दवा किहे ना काम करी,
टोना - टटका, जन्तर - मन्तर।
तुम मनई हौ या घनचक्कर ।
लरिकउना अरजी दिहे रहा,
आवा ततकाल बोलउवा है।
है भरती पुलिस दरोगा कै,
लगवायौ तगड़ा पउवा है।
मुलु जाय दिहेव न तुम वहिका,
बतलायो भद्दर दिसासूर।
भरती वहिकै न होइ पाई,
बतलाओ केहिका है कसूर।
अब सोर्स सिफारिस करै का,
जब पालेव है अइसा चक्कर।
तुम मनई हौ या घनचक्कर ।
तुम चलेउ बर देखी का घर के,
बिलिरीवा रस्ता दिहिसि काटि।
चट्टै तुम लउटि परेन घर का,
फिर निकरेव घर ते दहिउ चाटि।
यहि लउट पउट के चक्कर मा,
हरबर - हरबर टेसन आयेव।
गै छूटि गड़ीवा पता चला,
तब बहुतै मन मा पछितायेव।
अइसेन पछितइहौ रातिउ दिन,
जो पलिहौ रूढ़िनि का चक्कर।
तुम मनई हौ या घनचक्कर ।
करिया अच्छर से लट्ठ चला,
नित रहेव लकीरन के फकीर।
बिना सोचे समझे अँधियारे मा,
अब तक तुम मारत रहेव तीर।
अब बदलौ आपन ढंग - ढर्रा,
सिच्छा ते थ्वारा करउ प्रीति।
यह झाड़-फूँक, टोना-टटका,
जादू का जानउ तुम कुरीति।
जब ग्यान जगा अग्यान हटी तो,
खइहौ दिन दिन घिउ सक्कर।
तुम मनई हौ या घनचक्कर ।



बताई का ददुआ
घ्वाड़ा पिटैं अकाज बताई का ददुआ।
गदहन के सिर ताज बताई का ददुआ।
अम्मा - बप्पा के पइसा से सेखी मारैं,
अइसे हैं रंगबाज बताई का ददुआ।
देंहीं कै देउखरी लगावैं रोजु मेहरिया,
लागत नहीं है लाज बताई का ददुआ।
निरधनिया कै लाज लूटि धनवानन लीन्हा,
चुप्पे बइठ समाज बताई का ददुआ।
जो गरीब का रकत - पसीना चूसि रहे,
गिरत ना उनपर गाज बताई का ददुआ।
भासन से मनइनि का खाली पेटु भरत हैं,
नेता राम नेवाज बताई का ददुआ।
जिनका दीन्हा वोट बने संसद मा द्याखौ,
लोक - तन्त्र कै खाज बताई का ददुआ।



          कुछ खरी-खोटी

कै हो इन्द्र देव काह? फूटि गयीं दून्हौ हवैं,
जन्ता कै त्राहि- त्राहि तुमका न देखात है।
बड़ा है घमण्ड तुमका दुख नहिं देखि परै,
उमड़ि - घुमड़ि के देखावत औकात है।
गाँठत रुआब मुला पानी तो गिरत नाहीं,
दम - खम कुछौ नहीं हमका देखात है।
कहूँ बाढ़ कहूँ सूखा मरत किसान भूँखा,
सुरजौ तपत सब जरा - बरा जात है।


        गवनई 

घर मा छाई है अजब बहार,
आजु घर बिटिया भई है।
सबके तन मन फूले न समावैं।
लक्ष्मी का भयो अवतार।
आजु घर बिटिया भई है।
बिटिया सुनि हर्षित सब होइगें,
छाई है खुशी मन अपार।
आजु घर बिटिया भई है।
हँसी खुशी पढ़ि लिखिके बिटिया,
दोउ कुल करी उँजियार।
आजु घर बिटिया भई है।
बाबा औ आजी मम्मी औ पापा,
सगरा खुशी है परिवार ।
आजु घर बिटिया भई है।
लड्डू औ पेंड़ा बाबा आजी बाटैं,
पापा भी करावैं जेउनार।
आजु घर बिटिया भई है।
घर मा सखी मिलि सोहर गावैं,
बाजै बधइया मोरे द्वार।
आजु घर बिटिया भई है।


        गवनई 2 
नहीं ब्याहे कै हमका उमर मम्मी।
कइसे ससुरे मा होई बसर मम्मी।
अबहीं तो मम्मी हम बहुतै छोटी।
कुछ हूँ न जानी अकिल है मोटी।
तुम कबकै निकरतू कसर मम्मी।
कइसे ससुरे मा होई बसर मम्मी।
अबहीं तो मम्मी इस्कूलै जाइब।
पढ़ि लिखि आपन भाग्य बनाइब।
पढ़ै लिक्खै कै हमरी उमर मम्मी।
कइसे ससुरे मा होई बसर मम्मी।
पापा का मम्मी या देउ समुझाई।
बिटिया का अपनी दियंइ पढ़ाई।
अब राखौ न यहिमा कसर मम्मी।
कइसे ससुरे मा होई बसर मम्मी।
पढ़ि लिखिके जब जाबै ससुरारी।
सब मइहाँ मम्मी रहबइ पियारी।
हमरी सिच्छा का होई असर मम्मी।
कइसे ससुरे मा होई बसर मम्मी।



       गवनई 3

ब्याहे कै जल्दी नहीं करौ पापा,
पहिले तो देउ पढाय रे।
पढ़े - लिखे कै बातै अउरि पापा,
सुनि लेउ ध्यान लगाय रे।
इण्टर बीए एमे करबै हम पापा,
होइ जइबै होसियार रे।
देवर ननद सब खुस होइ जइहैं,
भउजी है नाहीं गवाँर रे।
सास ससुर तब कानी न मरिहैं,
सिखि ल्याबै सब काम रे।
सिच्छा का भिच्छा लइके पापा,
करबै जगत मा नाव रे।
पढ़ि लिखि के जब ससुरे जइबै,
खुस होई घर परिवार रे।
सबकी पियारी बनिके रहब हम,
मानउ यह बचन हमार रे।
बोले हैं पापा तब सुन मेरी बेटी,
पढ़उ इस्कूल मा जाय रे।
जेतना तुम पढ़िहौ उतना पढ़इबै,
खूब पढ़ै मनवा लगाय रे।
सोच करो जनि सोने की चिरइया,
नहीं हुऔ तुम परेसान रे।
जइसेन चहिहौ वइसेन करब हम,
तुम हौ बिटिया महान रे।
बिटिया नहीं तुम देबी हौ घर की,
दुर्गा लछमी क अउतार रे।
तुमहिनि से घर मा फइलै उँजेरिया,
तुमहिनि से घर अँधियार रे।
बढ़ी लिखा घर आवै जो बहुरिया,
घर का चमन करि देय रे।
अनपढ़ बहुरिया घर मा जो आवै,
घर का नरक करि देय रे।



         दूरि तब अग्यान होई

जबै बेटवन की तना बिटिया धरा पर प्यार पइहैं।
जन्म पर बाजी बधइया बाप माँ खुसियाँ मनइहैं।
जबै भूल सुधार होई लोग बिटियन का पढ़इहैं।
औ देवइहैं नीकि सिच्छा भागि बिटियन के जगइहैं।
कली बनिहैं फूल सुन्दर बाटिका अरघान होई।
दूरि तब अग्यान होई।
जब दहेजु का पाप मनिहैं बिन दहेजु बियाहु होई।
दहेजु लोभी ससुर के मन जब बहू कै चाह होई।
ननद औ भौजाई मिलिके सारे घर के काम करिहैं।
जबै बिटिया - बहू का सासुइ बराबर प्यार करिहैं।
लेन - देन नहिं होई तनिकौ सुद्ध कन्यादान होई।
दूरि तब अग्यान होई।
जबै घूँघट कै कुपरथा यहि समाज से दूरि होई।
बेटी बनि रहिहैं बहुरिया कामना सब पूरि होई।
जब देखावा दूरि होइहैं सादगी सब मा देखाई।
जब घमण्ड मा चूर मनई फालतू न धन गंवाई।
झाड़ फूँक से दूरि रहिके सदगुणन कै खान होई। 
दूरि तब अग्यान होई।
जब बिबस बिधवा बेचारी मान व सम्मान पाई।
नहिं कोहू पर बोझ बनिके फेरि घरु आपन बसाई।
जब सपूतन के हिया बिधवा बियाहु कै चाह जागी।
फेरि करि बियाहु बिधवा रही पति कै प्रेम पागी।
जब कुरीती दूरि होइहैं नीक मंगल - गान होई।
दूरि तब अग्यान होई।
जो बने धनवान घूमत जब बड़प्पन का देखइहैं।
कै गरीबन तो मोहब्बत प्यार ते छाती लगइहैं।
मनई - मनई एकु होइहैं प्रेम से सब काम होइहैं।
औ मिटी अँघियार मनका नीति का डंका बजइहैं।
तब कटी यह रीति दुख कै अउर सुखद बिहान होई।
दूरि तब अग्यान होई।


पद  
(१)
बरसात के हाल कही कहिसे,
अब लागत है रोजुइ झलबदरा।
नहिं काम हुवै नहिं धाम हुवै,
सब देखि परै जइसे अदगदरा।
दिन - राति रहत बुँदियात जलै,
चुचुआइ रहें छानी अरु छपरा।
अस ऊधम जोेति रहा मौसम,
निकरे हैं पाँव न बाढ़त चदरा।
(२)
तन पीर बढ़ी मन धीर नहीं,
है सुलुगि रहा पानिउ मा जियरा।
अब नेहु - निहोरु बढ़ा अइसा,
जस भाँग भँगेड़ी है छाने परा।
जस हमरी है तस तुम्हरिउ दसा,
कुदसै - कुदसा हमरी अरु तुम्हरा।
हम घर मा हन परदेस म तुम,
होइगें असि पोढ़ि हैं सबके हियरा।





पता- 

इन्द्रेश भदौरिया *रायबरेली*
ग्राम - मोहम्मद मऊ पोस्ट - कठवारा जिला - रायबरेली ( उ०प्र०) २२९३०३
मोबाइल नं. 089531 76160