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मंगलवार, 30 जून 2015

अनुराग सिंह की अवधी गजलें




अनुराग सिंह अवधी के तरुण रचनाकर हैं और विज्ञान विषय में शोधरत । इन्होंने अपनी दो अवधी गजलें 'खरखइंचा' ब्लॉग के लिए भेजी हैं । इन गजलों में एक युवा मन की देशज चेतना की अभिव्यक्ति आप देख सकते हैं । आज प्रस्तुत हैं अनुराग सिंह ( Anurag Singh ) की अवधी गजलें !   


                               (1)



दिखाइन ख़्वाब महलन के हकीकत तुम मगर देखौ बड़ी एंड़ी जो रगरेन है, मिले मिटटी के घर देखौ कबौ गेहूं कबौ चावल कबौ सब्जी कबौ डीजल भला होई का गवा है यार महंगाई के दर देखौ कतो चोरी कतो डाका छिनैती रेप मक्कारी उठा अखबार जो तुम ल्यो यहै होई खबर देखौ लड़ाई अउर दंगा है भवा इंसान नंगा है नहीं इंसानियत बाकी बची दिल मा अगर देखौ बड़ा धोखा दियै मौसम न या सरकार कुछ सोंचै सिंचाई होइ चुकी अबकिउ तनी सूखी नहर देखौ करिन दम भर के दोहन है बिगाड़िन सन्तुलन खुद हे जो अब भूकम्प आवा तौ तनी इन सब का डर देखौ कटैं जंगल करैं कब्ज़ा बढ़ावैं खूब परदूसन
यहै सब देखि के बरसा रहा मालिक कहर देखौ



(2)


देखौ तनी इ नेता कैसे खाय रहे हैं

सब लूटि लूटि देश का बौराय रहे हैं



ई पांच साल से कबौ घर ते नहीं निकरें
अब वोट लेइ घरे घरे जाय रहे हैं



दीमक के जैसे लागि के खोखला यइ करिन

अब गीत देश प्रेम के इ गाय रहे हैं




गोबर गंवार धुल से इनका है एलर्जी
अब आज काल इनका ई सब भाय रहे हैं


लेकिन फिरौ ऋषी सबै हैं आँखि के आँधर
हर बार वोट दई के चोट खाय रहे हैं



© अनुराग सिंह "ऋषी"



परिचय - अनुराग सिंह "ऋषी" मूलनिवास- लखनऊ वर्तमान निवास- छात्रावास इलाहाबाद संप्रति - शोधछात्र (वनस्पति विज्ञान) मो. न. 09415953952 ईमेल - anu.007om@gmail.com

सोमवार, 22 जून 2015

डॉ. प्रदीप शुक्ल की अवधी कविताएं





"गायब बिकासु तो फिरि खाली ज़मीन का करिहौ
देहीं म कुछु न राख्योकपड़ा महीन का करिहौ

तुम लौटि चलौ वापस फिरि बीसवीं सदी मा
हरहै जो चरावै क है तो लरिका जहीन का करिहौ

संसद म सबै मिलिकै जब पास किहिनि बिल का
अब वही अडवानी भये ध्यानलीन का करिहौ

तब दौरि दौरि तुमही हमका बनायो मुखिया 
थोड़ी जमीन तुम ते जो लई लीन का करिहौ

अच्छे दिनन क भय्या तुम टुकुर टुकुर द्याखौ
अब जौनु मनै भावा हम वहै कीन का करिहौ !!"

ऊंची तालीम पाये हुये पेशे से डॉक्टर हैं प्रदीप शुक्ल जी और कवितायें अवधी में लिखते हैं । वह अपनी गंवई लोक चेतना के स्वाभाविक सहृदय कवि हैं । उनकी कवितायें अपने समय और समाज की गहरी लोक चेतना की स्वाभाविक उपज हैं । वह पढ़े-लिखे और विशिष्ट समाज वाले लखनऊ में रहते हैं जहां देहाती अवधी बोलने में भी लोग संकोच करते हैं । प्रदीप जी इस चुप्पी को तोड़ने वाले स्वाभाविक और गंवई गंभीरता के कवि हैं । उनकी कविताओं में समय की राजनीति का घटिया विद्रूप चेहरा यथार्थ रूप में अभिव्यक्त हुआ है । वह समय की सामाजिक विशंगतियों को लोक की विवेक-दृष्टि से देखने वाले ऊर्जावान कवि हैं । उनकी अवधी कवितायें इस बात की पुख्ता सबूत हैं कि स्वाभाविकता का सफल दस्तावेज़ हम अपनी मातृभाषा में ही प्रस्तुत कर सकते हैं । उनकी कविता में अवधी के जन प्रचलित आल्हा-छंद का प्रयोग बेजोड़ है इसके अतिरिक्त वह अवधी की लोक लय और भाषा के चरित्र को कविता में सँजोने वाले कवि हैं । तो आइये पढ़ते हैं अपनी अवधी के समकालीन कवि डॉ. प्रदीप शुक्ल Pradeep Shukl की बेहतरीन अवधी कवितायें !    


!! गर्मी के मारे बुरा हालु !!

गर्मी के मारे
बुरा हालु
गर्मी का कउन बखान करी

भोरहें ते
सूरजु लपलपाय
लीन्हें आँखिन मा अंगारा
मानुष तो दिन भरि लुका रहै
अंतरे कोने मा बेचारा

बिनु पानी
पंछी बेदम हैं
लागति अब उनका जिउ निकरी

तालन का
पानी सूखि गवा
नदिया बिल्कुल पातरि होईगै
बरगदहा ख्यात म बरगद कै
अब तो केवल ठूंठी रहिगै

नीम्बी के
पंचपेड़वा कटिगे
बस बाकी बची हवै पकरी

काका
छप्परु गिरवाय दिहिन
औ पक्का कमरा बनवाइन
अब वहु भट्ठी अस धधकि रहा
आँखी कढती हैं ककुआईन

मचिया लीन्हें
उई घूमि रहीं
है कमरा मा तो आगि भरी.

# डॉ. प्रदीप शुक्ल
  21.06.2015
!! सेठ हमारे अम्मा बप्पा !!

गर्मी मा भगमच्छरु कीन्हे
बिजली सुनै कोहू कै नाय
हुआँ हस्तिनापुर मा द्याखौ
मोदी दीन्हेसि आगि लगाय

चुऐ पसीना टप टप टप टप
ए सी चलै जहाँ दिनु राति
साहेब मौनु धरे हैं भईय्या
उनते कुछौ कहा ना जाति

होति अँधेरा रोजु राति मा
अर्नब गोस्वामी चिल्लाय
वहिका देखतै हमरा पड़वा
जोर जोर ते रहा बम्बाय

सेठ हमारे अम्मा बप्पा
उनके बिना कौनि सरकार
हियाँ फटीचर रामदीन ते
काहे करैं बात ब्योहार

मानवता सब उनके खातिर
जो लन्दन मा मौजु उड़ाय
पर तुम उनकी बात न पूछौ
जो ईराक मा गए बिलाय

दादा अडवानी अब द्याखौ
लागति ज्यादा गए बुढाय
रामराज मा उनका भईय्या
आपतकाल रहा सपन्याय

खाली बइठ रहन हम भईय्या
तौ यहु आल्हा दीन सुनाय
बंद करौ यहु टी वी काका 
बेमतलब मा खोपड़ी खाय !!


                         19.06.2015



!! रामदीन - छग्गन मियाँ !!

चलौ चली छग्गन मियाँ, जहाँ सिटी स्मार्ट
झाडू पोंछा तौ मिली, ...... ढूँढो कउनो मार्ट

खेती तुम्हरे बसि नहीं, रामदीन सुनि लेव
साहेब कब ते कहि रहे, तुम जमीन दई देव

बनी हाईवे अईसि तब, लप लप डामरु होय
सर्र सर्र मोटर चलैं, .....रहौ सपन मा खोय

रोजु शाम का तुम हुआँ, मोटर द्याखै जाव
लौटि क घर मा अफरि कै, सूखी रोटी खाव

दुरिही ते देख्यो मगर, रह्यो बहुत हुशियार
हाईवे पर जो रुकि गयो, तुमका डरिहैं मार !!

  06.05.2015



!! कहौ अब कहाँ मरि जाई !!

चैतु चलै पुरवाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

खड़ी फसल मा ओला परिगे
दाना सब बालिन ते झरिगे
आवै लागि रुलाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

तुम तो साहिब रहतु बिदेसवा
हियाँ गाँव मा आजु सुरेसवा
काटि लिहिस है कलाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

जहिका पईसा लीन बियाजे
वहु डेहरी पर रोजु बिराजे
आवति होई कसाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

खेतु आय यहु परधानन का
पईसा मिली तो मिलि जाई उनका
हम तो लीन बटाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

एतना तो खाता मा डारौ
खाय लेय परिवार हमारौ
चूहा - मार दवाई
कहौ अब कहाँ मरि जाई

  13.04.2015



!! होरी है ..... होरी है !!

अबकी होरी मा सुनो, .... तुम घूरे परसाद
गुझिया खईहैं जेटली, तुम पा जइहौ स्वाद !!

मोदी कक्का कहिनि हैं, मनरेगा ना जाय
घर मा तुम बइठे रहौ, नाम देव लिखवाय !!

' बजेट ' बहुत अच्छा बना, कक्का दिहिन बताय
जूता सस्ता हुइ गवा, ........ खोपड़ी लेव बजाय !!

राहुल भय्या कहाँ गे, कोऊ उन्हें समझाव
भागे ते कुछु ना मिली, ताल ठोंकि कै आव !!

छुपे छुपे काहे फिरौ, निकरि सामने आव
अबकी होरी मा सुनौ, भौजी साथै लाव !!

  02.03.2015




..............भक्तों !! ...  चलौ फागु होई जाय ................

साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ ..........साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ

लोक सभा मा उई हुंकारैं मनरेगा तो रही गुइंयाँ
कांग्रेस का बना मकबरा कैसे गिरा देई गुइंयाँ ... साहेब के बोल सुनौ गुइंयाँ
साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ .......... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ

मुफ़्ती साहेब पाँव छुई रहे पाकिस्तान के हो गुइंयाँ
अपने साहेब जिरजिरायं कुछु बोलि न पावैं हो गुइंयाँ .... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ
साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ ........... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ

राजकुँवर अज्ञातवास मा चले गए हैं अब गुइंयाँ
ढूँढि रहे सब चमचा उनका पता नहीं पावैं गुइंयाँ  ....... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ
साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ ........... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ

सुनति सुनति भाषण तुम्हार अब नौ महिना हुईगे गुइंयाँ
रामदीन चिल्लाय रहा कुछु वहिकी बात सुनौ गुइंयाँ  .... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ
साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ ........... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ

छत्तिस तरह के व्यंजन खावैं उनतिस रुपये म उई गुइंयाँ
उनतिस मा सल्फास की गोली मिलै न घुरहू का गुइंयाँ .... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ
साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ .......... साहेब के बोल सुनौ गुइयाँ !!

...... होरी है ..... होरी है ..... होरी है .......

  03.03.2015




!!  बुरा न मानौ होरी है !!

वोट दीन अब खेतौ लेहौ
यह तो सीना जोरी है
साहेब बस मुसकाय क बोले
बुरा न मानौ होरी है

पुरिखन कै
यह आय निशानी
हम मानिति है भय्या
बुलेट ट्रेन लेकिन जब चलिहैं
लखिहैं तुम्हरी गय्या
सब लरिकन का रोज़गार मा
मूंगफली की झोरी है
बुरा न मानौ होरी है

पइसा तुमका
मिली तो मन चाहा
तुम वहिका फेंका
यही के मारे सड़क के
दूनों ओर खुलावा ठेका
खाओ पीयो मउज मनाऔ
यह जिनगी बस थोरी है
बुरा न मानौ होरी है

रोजु रोजु
घामे मा काहे
कीन्ह्यो खून पसीना
हम संभारि ल्याब तुम बइठौ,
हमरे छप्पन सीना
करौ, ख़ुदकुशी लीगल होइगै
अबहीं चादर कोरी है
बुरा न मानौ होरी है !!

   26.02.2015




!! खाली ज़मीन का करिहौ !!

गायब बिकासु तो फिरि खाली ज़मीन का करिहौ
देहीं म कुछु न राख्यो, कपड़ा महीन का करिहौ

तुम लौटि चलौ वापस फिरि बीसवीं सदी मा
हरहै जो चरावै क है तो लरिका जहीन का करिहौ

संसद म सबै मिलिकै जब पास किहिनि बिल का
अब वही अडवानी भये ध्यानलीन का करिहौ

तब दौरि दौरि तुमही हमका बनायो मुखिया 
थोड़ी जमीन तुम ते जो लई लीन का करिहौ

अच्छे दिनन क भय्या तुम टुकुर टुकुर द्याखौ
अब जौनु मनै भावा हम वहै कीन का करिहौ !!

  25.02.2015




!! फगुनहुटा नगिच्याय रहा !!

छोडि रजाई बाहर झाँकौ
फगुनहुटा नगिच्याय रहा 

झारि क अपन पुराने पत्ता
नीम्बी लगै नवेली
फुंगनी पर अब हरियर सुगना
करै लाग अठखेली

पिछवारे महुए का बिरवा
गलियारा महकाय रहा
छोडि रजाई बाहर झाँकौ
फगुनहुटा नगिच्याय रहा 

आँखि खुलै सूरज की जल्दी
किरनैं दौरि क लपिटैं
धूप देखि कै मगन मुरैला
पखनन कइहां झटकैं

दूरि ताल पर सारस जोड़ा
आपस मा बेल्हराय रहा
छोडि रजाई बाहर झाँकौ
फगुनहुटा नगिच्याय रहा

गेहूँ है उम्मीद ते अब तो
खड़ी खड़ी मुसकाय
पीली चूनरि ओढ़े सरसों
देखि देखि शरमाय

चने क बूटा घूरि रहा ना 
पलकन का झपकाय रहा
छोडि रजाई बाहर झाँकौ
फगुनहुटा नगिच्याय रहा

  02.02.2015




!! सूरज देउता कहाँ छुपाने हौ !!

नए साल मा जाने कौनि
अदावत ठाने हौ
ई जाड़े मा सूरज देउता
कहाँ छुपाने हौ.

अजिया बैठे किटकिटायँ
कथरी गोंदरी ओढ़े
हिम्मति नहीं जो चली जायँ
लोटिया लइकै गोंड़े

ठिठुरन मा काहे उनका
कीन्हे बैठाने हो
ई जाड़े मा सूरज देउता
कहाँ छुपाने हौ

लकड़ी गाँवन मा बची नहीं
तपता बारैं कईसे
काका रजाई ते झाँकि रहे
घुघुआ झाँकै जईसे
 
मुहुँ ख्वालौ काहे कोहिरा की
चादर ताने हौ
ई जाड़े मा सूरज देउता
कहाँ छुपाने हौ

निकरौ बाहर देखि लेव
बस कत्ले आम मचा
चउतरफा दुनिया मा केवल
घुप अँधियार बचा

जल्दी ते कुछु करौ,
कहे बदि बैठ चियाने हौ
ई जाड़े मा सूरज देउता
कहाँ छुपाने हौ

  09.01.2015




!! नई बहुरिया दावत ठाने है !!

मन्नो काकी के घर मा कोउ
बात न माने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

काकी खटिया पर
बरोठ मा
खाँसे जाती हैं
बीच बीच मा काका के
ऊपर चिल्लाती हैं

काका द्याखैं टुकुर टुकुर
बैठे सिरहाने हैं
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

' पानी - पानी ' के
ऊपर बस
नाचि रहे सारे
बहुत देर ते पानी माँगति
काका बेचारे

अधखाई थाली खटिया
रक्खी पैताने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है

बड़की भौजी
डारे घूँघट
नाचि रहीं जमके
नई बहुरिया पैंट पहिन
पूरे आँगन थिरके

खाँसि खखारति ससुरौ का
वह ना पहिचाने है
नए साल मा नई बहुरिया
दावत ठाने है !!

  31 दिसंबर, 2014



!! मोदी काका के नाम चिट्ठी !!

नए साल मा मोदी काका तुमका चिट्ठी लिखी संभारि
जब बिदेस ते मौक़ा मिलि जाय तब यह चिट्ठी पढउ हमारि

श्रीमान् मोदी काका जी पहिले स्वीकारो परनाम
राम तुम्हारा भला करैं पर हम तो जपिति तुम्हारै नाम

हियाँ हाल सब ठीक ठाक हैं तुम बस आपन हाल बताव
पिछले पूरे साल तो काका केवल खेलति रह्यो चुनाव

अब हमरे अइसियु तन द्याखौ ' शी जिन पिंग ' का देउ भुलाय
चचा ओबामा तुम पर हंसिहैं अपनि जो हालति दीन बताय

साफ सफाई का यहु आलम पूरे ख्यात सफा चट्टान
घर मा भूंजी भाँग नहीं है पइसा नहीं साफ़ मैदान

गैय्या बेचेन भैंसी बेचेन बिल्कुल साफ़ है परा दुआर
गड़ही वाला खेतौ बेचेन तबहूँ अबहीं बचा उधार

बंक म खाता खुलवा दीन है जैसी आज्ञा रहै तुम्हारि
पइसन खातिर रोजु मनेजर हमका देति हवै दुत्कारि

पंद्रह लाख रुपय्या काका तुम तो कह्यो रहै गोहराय
जल्दी ते पैसा भिजवाओ काहे रोजु रह्यो भरमाय

भद्दरु जाड़ा आवै वाला कम्बरु खीसै दिहिसि निकार
पइसा होय तो लाई रजाई अबे आसरा हवै तुम्हार

बड़की बिटिया की शादी का खर्चा सगरा तुम्हरे नाम
जैसे पइसा बंक म आई तुरत फ़ुरत सब होई जाई काम

अउर हियाँ सब ठीक ठाक है तुमहूँ आपन रख्यो ख़याल
चिट्ठी मिलतै उत्तर दीन्ह्यो लिखि भेज्यो बिदेश का हाल ॥ 




© डॉ. प्रदीप शुक्ल 



परिचय –

डॉ. प्रदीप शुक्ल

माता – श्रीमती गंगा दुलारी शुक्ला
पिता – श्री गिरिजा शंकर शुक्ला
जन्म – 29 जून, 1967 को लखनऊ जिले के छोटे से गांव भौकापुर में एक गरीब किसान परिवार में.
शिक्षा – प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही, बी.एससी. कान्यकुब्ज कॉलेज, लखनऊ.
       एम बी बी एस, एम डी ( स्वर्ण पदक )किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ
हिंदी साहित्य में बचपन से ही रूचि परन्तु कविता लिखने का सिलसिला शुरू हुआ अक्टूबर, 2013 से, वर्तमान में लखनऊ में “ केवल बच्चों के लिए एक हॉस्पिटल “ जहां पर चौबीस घंटे बीमार बच्चों की देखभाल के लिए उपलब्ध, उसी से कुछ समय चुरा कर कविता लिखने का प्रयास.
प्रकाशित रचनाएं – संयुक्त काव्य संग्रह “ सारांश समय का “ एवं “ पारिजात “ में रचनाएं, कोलकाता से प्रकाशित “ उड़ान “ पत्रिका में रचनाएं, कुछ कुण्डलियाँ “ बाबू जी का भारत मित्र “ पत्रिका में – सम्पादक श्री रघुविन्द्र यादव जी, दो रचनाएं “ शोध दिशा “ के फेस बुक विशेषांक में ( सम्पादक श्री लालित्य ललित ), कुण्डलियाँ और नवगीत ई – पत्रिका “ अनुभूति “ में ( सम्पादक श्रीमती पूर्णिमा वर्मन ), कुछ कह मुकरी “ हमारा मेट्रो “- दिल्ली में प्रकाशित.
पता – डॉ. प्रदीप शुक्ल ( डॉ. पी. के. शुक्ला )
      गंगा चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल
     N. H. – 1, सेक्टर – डी, LDA कॉलोनी, कानपुर रोड, लखनऊ – 226012
     फ़ोन – 0522 – 4004026, 2431122, मोबाइल – 09415029713

         E – Mail – drpradeepkshukla@gmail.com