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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

शैलेंद्र कुमार शुक्ल की कविता






बेरोजगारी में कुछ अवधी शेर
(रफीक चचा से भाषा उधार लेते हुए)


तमाशा बनाइ के रख्खे हौ
  कोई झूठा फ़साद थोड़े है ।
बेरोजगारी मा मरत है देखौ
कोई गलगल कमात थोड़े है ॥


भीख मांगत है,खीस काढ़त है
ग्रेजुएट है बकलोल थोड़े है ।
इक नौकरी खातिर दीहिस रहे अर्जी
दलाली भई है, फेल थोड़े है ॥


केतने पद खाली हैं यहि देश मा नौकरी के
जवाब मांगत है उतान थोड़े है ।
आँख फोड़िस है किताब चाटिस है
रात भर जागा है कमजोर थोड़े है ॥

इक नौकरी मिले की देरी है
कोई सूखे पारन थोड़े है ।
संसद मा दाग तौ औरौ लगे है लेकिन
यहि से तगड़ा कौनौ निशान थोड़े है ॥
-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

2 टिप्‍पणियां:

  1. भदौरियाजी जनचेतना के कवि हैं।तुलसी,जायसी,जगदीश गुप्त,काका आदि न जाने कितने अवधी भाषा के मनीषियों की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अवधी को जीवित किये हुए हैं।लगातार अपने समय व् समाज को कविता के माध्यम से जीते हुए अवधी को जी रहे हैं।भोजपुरी के सांस्कृतिक कद के सामने बोलियों की सिरमौर अवधी का कद छोटा पड़ने लगा है।आवश्यकता है भदौरिया जी को प्रोत्साहन देने की ।इसके लिए सरकारी व् असरकारी स्तर पर व्यापक प्रयास होने चाहिये।

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  2. भदौरियाजी जनचेतना के कवि हैं।तुलसी,जायसी,जगदीश गुप्त,काका आदि न जाने कितने अवधी भाषा के मनीषियों की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए अवधी को जीवित किये हुए हैं।लगातार अपने समय व् समाज को कविता के माध्यम से जीते हुए अवधी को जी रहे हैं।भोजपुरी के सांस्कृतिक कद के सामने बोलियों की सिरमौर अवधी का कद छोटा पड़ने लगा है।आवश्यकता है भदौरिया जी को प्रोत्साहन देने की ।इसके लिए सरकारी व् असरकारी स्तर पर व्यापक प्रयास होने चाहिये।

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