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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

शैलेंद्र कुमार शुक्ल की कविता






बेरोजगारी में कुछ अवधी शेर
(रफीक चचा से भाषा उधार लेते हुए)


तमाशा बनाइ के रख्खे हौ
  कोई झूठा फ़साद थोड़े है ।
बेरोजगारी मा मरत है देखौ
कोई गलगल कमात थोड़े है ॥


भीख मांगत है,खीस काढ़त है
ग्रेजुएट है बकलोल थोड़े है ।
इक नौकरी खातिर दीहिस रहे अर्जी
दलाली भई है, फेल थोड़े है ॥


केतने पद खाली हैं यहि देश मा नौकरी के
जवाब मांगत है उतान थोड़े है ।
आँख फोड़िस है किताब चाटिस है
रात भर जागा है कमजोर थोड़े है ॥

इक नौकरी मिले की देरी है
कोई सूखे पारन थोड़े है ।
संसद मा दाग तौ औरौ लगे है लेकिन
यहि से तगड़ा कौनौ निशान थोड़े है ॥
-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल