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सोमवार, 22 अगस्त 2016

सर्वेश त्रिपाठी की अवधी कविताएं



आओ पढ़ौ आजु बहराइच की माटी से उपजी यइ अवधी कविता। सर्वेश की कविता मा अवधी क्यार मिजाज है।     



तुम परे परे सोइहव कब तक


तुम परे परे सोइहव कब तक अब जागि जाव अब जागि जाव मुसवा घर मा बिल खोदि रहे अब जागि जाव अब जागि जाव पुरिखा तुम्हरे धरती खातिर आपन मूड़ कटाय दिहिन अपनी मेहनत से सींचि सींचि बंजर का खेत बनाय दिहिन तुम वहि बलिदानी भुइयाँ का पूँजीपतियन का बेंचि रहे अपने बाबा की छाती पर छूरी से रेखा खींचि रहे अपनै गोड़वा न खुद काटौ अब मानि जाव अब मानि जाव।
तुम परे परे सोइहव कब तक अब जागि जाव अब जागि जाव। जेहिका जोतत जोतत तुम्हरा बड़का बरधा हैरान भवा जेहिकी माटी से खाय खाय छोटका भी आज सयान भवा जेहिमा बाबा जी फूंके गे जेहिमा आजी के गीत बसे जेहिमा अम्मा बप्पा तुमका संग मा लै लै के खूब हँसे वहिका तुमसे सब छोरत हैं,यहु जानि जाव यहु जानि जाव तुम परे परे सोइहव कब तक अब जागि जाव अब जागि जाव। जौन मिलै रूखी सूखी ऊ खाव गर्व से फिरा करौ बांधि मुड़ैछा फरुहा लै अपने खेतन मा रहा करौ खेतय तुम्हार है स्वाभिमान,वहिका न अपनेस दूर करौ बिन खेत किसान लगै मुर्दा,खुद का न अस मजबूर करौ भुइयाँ तुम्हरे घर की इज्जत,वहिपर जीवन कुरबान जाव तुम परे परे सोइहव कब तक अब जागि जाव अब जागि जाव। वही खेत की नई फसल से जाने कतने नवा किहेव वहिकी खातिर जाने कतना बरखा गरमी हवा सहेव अब तुम्हरी उइ भुइयाँ पर गाड़ी सब चलिहैं नई नई जिहेमा तुम अन्न उगावत थे,अब बनिहैं बिल्डिंग नई नई बस खड़े खड़े ताका करिहौ अतना पोढ़े से जानि जाव तुम परे परे सोइहव कब तक अब जागि जाव अब जागि जाव।


किसानी
फटहा छपरा
चहला दुअरा
टुटही खटिया
फुटही गगरी।
गिरवी है सरीर औ
नैनन नीर लिहे
टहरैं दुःख की
गठरी ।
भारत केर
किसानन की यहु
हालत है! कबहूँ
सुधरी??
कहुं तेल नहीं कहुं
खाद नही अंखिया
जिमि नीर भरी
बदरी।

संपर्क
सर्वेश त्रिपाठी
शोध छात्र,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी
मो. 9648701206





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