आजु की समकालीन अवधी कविता मा सबसे जोरदार नाम अमरेन्द्र अवधिया कै है। इनकी कविता अपने समय औ समाज मा गहराई तक धसी विसंगतिन औ विडंबनन कै बड़ी सामर्थ्य ते लकिरियउती है। कवितन मा जस वैज्ञानिक चेतना आहि, वस अवध कै लोक कला खूब निखरी है। समाज कै विकास खातिर तौ वहिके आधार कै प्रतिबद्धता है तार्किकता। अवधी कविता राजनीत से कब्बउ परहेज न किहिस, तौ यह वहिकी बड़ी खासियत आजौ पूरी सामर्थ्य लेहे देखात है। अमरेन्द्र अवधिया आजु की अवधी कै वह एतिहासिक मोड़ हैं जहां ते कविताई कै मयार बदलत है। उनकी काव्यदृष्टि और राजनीतिक रवैया बिल्कुल साफ है। वै पुरनकी पीढ़ी के कविन से यहि मामिले मा बिल्कुल अलग हैं कि वै व्यक्तिगत स्वार्थ साधे कविता कै दुनिया मा नाय आये हैं। उनका एक सामाजिक लछ है। वै अवधी समाज के सच्चे सपूत हैं जिनके प्रोत्साहन औ लगन कै बल पर एक और नई पीढ़ी खदबदाय लागि है । जेहिमा प्रगतिसिलता कै भरपूर ऊर्जा है। जउन झूठ का झूठ औ सांच के सांच कहि सकत है। अमरेन्द्र अवधिया अवधी कविता के इतिहास म अपने दौर के सबसे समझदार औ ईमानदार अवधिया हैं। यह बात आगे चलि के साहित्य के इतिहास मा बेर बेर दोहराई जाई। पढ़ीस, वंशीधर सुकुल, रमई काका और मृगेश आदी कविन के बाद जउन धारा बहुत कुछ रुकि गै रहे वह फिर से जगमगाय लागि है । आजु उनकी कुछ नई कविता पढ़ी जायँ जिनते बहुत कुछ जाने समुझे क मिली। (संपादक- शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)
1. जीजुड़ावन गीतु
जेकर देखेन हो सपनवा,
कवन देसवा!
हमयँ कहा गा, देस इहै आ, खींचिके एक खचिन्ना
रास्ट मानिके ओही क पूजेन, भईया, रातौ-दिन्ना
हमहूँ गाएन जन-गण-मनवा,
कवन देसवा!
जेकर...
कटी गुलामी लड़ै-भिड़ै मा, तउके मिली अजादी
वादा भवा, तरक्की होइहै, मिटि जाई बरबादी
झूठा निकरा कुलि बयनवा,
कवन देसवा!
जेकर...
कब्बौ हिन्दू, कब्बौ मुसलिम, कब्बौ सबरन-अबरन
कबौ सिक्ख औ कबौ इसाई, बनिके जानी दुसमन
खेली झगरा भर मैदनवा,
कवन देसवा!
जेकर...
बाहर-भित्तर, सब कतहूँ हयँ, नेतवय रारि फँसाये
जनता क अपसेम् उलझाये, अपुवा मौजि उड़ाये
जनमे घरहीं मा दुसमनवा,
कवन देसवा!
जेकर...
अपनेन देस मा बना ‘बाहरी’, मारा-कूचा जाई
तुहिन बतावो, कैसे गाई : जय-जय भारत माई
केहिका बोली हिन्दुस्तनवा,
कवन देसवा!
जेकर...
(8.10.18)
2. कमीना-पचीसी...
होई कमीनन कै रचि राखा
को करि तर्क बढ़ावै साखा**
खित्ता खित्ता अहयँ कमीनय
बित्ता बित्ता रहयँ कमीनय
दुनिया भर मा भरा कमीनय
कहाँ नहीं अवतरा कमीनय
वर्डवार कयि दिहिन कमीनय
सीतजुद्ध दयि दिहिन कमीनय
हिटलर कै औलाद कमीनय
किहिन रूस बरबाद कमीनय
मिडिल ईस्ट कै पाप कमीनय
करैं अमरीकी जाप कमीनय
अरब महयँ बा-दीन कमीनय
चीन मा अऊर महीन कमीनय
डालर कै उत्पाद कमीनय
लिबरलहा उस्ताद कमीनय
पूंजीवाद कै खेप कमीनय
कीन्हिन ग्लोबल-रेप कमीनय
हिन्द देस मा घुटे कमीनय
दुनिया भर से जुटे कमीनय
आर्याबर्त कै सान कमीनय
बिस्वगुरू अभिमान कमीनय
कुछ हिगरा कुछ सॉफ्ट कमीनय
सब कुछ किहिन एडॉप्ट कमीनय
बोयिन तीत अतीत कमीनय
भेद-बुद्धि अनरीत कमीनय
आजौ हयं आबाद कमीनय
सकतहुँ जिन्दाबाद कमीनय
जब-जब करैं बिकास कमीनय
तब-तब करैं बिनास कमीनय
सबका करैं हतास कमीनय
औ फिर सत्यानास कमीनय
कहुँ भगवा कहुँ लाल कमीनय
हथओस् करैं कमाल कमीनय
लालटेन अस बरैं कमीनय
सैकिल पै चढ़ि परैं कमीनय
हथियौ पै आसीन कमीनय
मनुबादी रंगीन कमीनय
लिंग-जाति निरपेच्छ कमीनय
कमीनगी सापेच्छ कमीनय
मजहब-मजहब धंसा कमीनय
उपदेसन मा बसा कमीनय
धरम ग्रंथ से बड़ा कमीनय
भगवानौ पै चढ़ा कमीनय
अनपढ़वन मा थोर कमीनय
पढे-लिखेन मा ढेर कमीनय
सबसे आगे रहैं कमीनय
बनौ कमीना - कहैं कमीनय
होई कमीनन कै रचि राखा
को करि तर्क बढ़ावै साखा**
10/10/18
नोट : **शुरुआती दोनों पंक्तियां बाबा तुलसी की एक अर्धाली में थोड़े फेरफार के साथ रखी गयी हैं। बाबा से माफी मांगते हुए।
3. रफाइल मसला पै...
वाह रे राहुल
गजब कयि दिहेव!
पूँछ पकरिके अइसन खींचेव
बिल से चूहा पटकि धयि दिहेव!
वाह रे...
खलमंडली भै हक्का-बक्का
अईस पलीता ठोंकि ठयि दिहेव!
वाह रे...
गप्पू तुहुँका पप्पू बोलिन
तू चँपुआ पैगाम दयि दिहेव!
वाह रे...
4. बप्पा अऊर बिटियवा...
बिस्कुट क कहै ‘कुट्कुट्’
बप्पा क कहै ‘भप्पा’
बप्पा जौ कहूँ डोलयँ
हेरय ऊ चप्पा-चप्पा
बप्पा जौ बजारी से
बिन ‘जलेली’ आवयँ
ऊ माखि-माखि रूठै
उइ दौरिके मनावयँ
काँधे उठाये बिटिया
उइ गाँव घूमि डारयँ
मनहँग भये पै लौटैं
घर पहुँचिके उतारयँ
यक दिन उदास बप्पा
खोपड़ी टिकाये हाथे
उल्चिस गिलसिया पानी
बप्पौ फिन् हँसै लागे...
(जुलाई २०१३)
5. बे-लैनपैन हय जुवा बर्ग !
नेतक् जुबान गुण्डा अस भै
सधुवौ बोलयँ माहुर-बयान
पत्तरकारन क कही काव
मसखरा बने खोलयँ जबान
सबसे महीन बौद्धिक समाज
ऊ हर चिजिया उलझाये हय
भासा कै कतरन बाँटि-बाँटि
बस लिहो-लिहो करवाये हय
बे-लैनपैन हय जुवा बर्ग
चेतनाहीन अपसेम् बिखरा
कौरहा बना हय जहाँ-तहाँ
औ किहे जात झगरी-झगरा
सकतहुँ ‘पावर’ कै हनक भई
आंखी पै जाला पावर कै
पावर पैसा, पावर जुगाड़
सबही मतवाला पावर कै
गुण्डै-टुच्चै-मसखरै, देखि
ई मुआसरा, सोचय लागे :
‘ई तौ हमार हय स्वर्ण काल’
पावर साधिन, फैलय लागे.
6. दूध, पानी अउर खटास
“दोस्ती दूध औ पानी कै बताउब तुहुँका
काबिले-गौर नसीहत है सुनाउब तुहुँका
दूध पानी जौ बने यार तौ सबही चौंका
कुछ खुस भये मुला कुछ कै करेजा बैठा.
दूध पानी से कहिस, ‘‘हममा अब फरक कहाँ,
भाव तोहरौ लगे हमरेन कि-नाईं, बिकब जहाँ”
पानी अँसुवाइ कहिस, “भाय, हम एतनै कहबै
रहे खतरा तोरे खोपड़ी पै, हम पहिले मरबै”.
आग के उप्पर दूध रक्खा गवा, धिकवा गा
पानी बलिदान किहिस जरा-उड़ा- गायब भा
दूध अफसोस मा अफनाय दौरा आगी पै
तब्बै उप्पर से परा ठंडा छींटा पानी कै
दूध क लाग कि मन-मीत मिला, थिर होइगा
दोस्त क लिहे-लिहे बज्र-ताप सब सहिगा.
मुदा फिर एक रोज तनिका कहानी बदली
दोस्ती देखिके नेंबुआ के मची अस खजुली
लिहे खटास, ऊ यहि दोस्ती मा फाट परा
बोइस फूट, भा मनभेद, अउर सब बिगरा.”
(जुलाई-२०११)
7. आन द रिकार्ड अऊर आफ द रिकार्ड
मुँहे महयँ राम-राम आन द रिकार्ड
लूट-मार-छीन-कपट आफ द रिकार्ड
चिक्कन आदर्शवाद आन द रिकार्ड
बगुलहा यथार्थवाद आफ द रिकार्ड
हितवादी संविधान आन द रिकार्ड
मनुवादी उत्थान आफ द रिकार्ड
नारी सम्मानकारी आन द रिकार्ड
टोटल बलात्कारी आफ द रिकार्ड
ई वादी, ऊ वादी, आन द रिकार्ड
अनुवादी औसरवादी आफ द रिकार्ड
ई पंथी, ऊ पंथी, आन द रिकार्ड
पंथहीन साठगांठ आफ द रिकार्ड
वसुधैव कुटुम्बकम् आन द रिकार्ड
वर्णवाद भयंकरम् आफ द रिकार्ड
जै भीम लाल सलाम आन द रिकार्ड
पैरलल बभनवाद आफ द रिकार्ड
‘फलनवा है बहुत नीक’ आन द रिकार्ड
‘फलनवै दर मादर**’ आफ द रिकार्ड
देसप्रेम देसप्रेम आन द रिकार्ड
बेंचखाव बेंचखाव आफ द रिकार्ड
8. यहिते दूरी लिहेव बनाय.
माइक मंच कै नेउता पाय
सौ-सौ योजन निहुरे जाय
आंचा पांचा, तीन क तेरह
खोटा सिक्का दियै चलाय
अंगुरी करय लेखनी वाली
पक्के बगुलाभगत कि नाय
जेकरे तप्ता म सरदी काटै
ओकर दियनौ दियय बुताय
कब्बौ दक्खिन कब्बौ बाम
अवसरवादी केहिकै आय?
खड़ा करै गढ़-मठ सामंती
मठ तोडै कै कसमिउ खाय
छिन म मुल्ला छिन म पंडित
छिन म मरकस लेनिन, भाय
असमानता कै बीयौ बोवय
मुंह से कहै समाजिक न्याय
हम संघर्षी, हमहिन त्यागी
हम-रागी, हम-हम चिल्लाय
साथी, यू हिन्दी कै लेखक
यहिते दूरी लिहेव बनाय.
9. भौंकै जहती काटै कम
पटना मा है बम-चिक-बम
‘‘जाई भाग कहाँ पै हम’’!
जेकरे जेतना गूदा बाटै
ओकरे ओतनै बाटै दम
मंच लोभ मा निहुरे जाय
फर्जी लिखिके ठोकै खम
कुकुरहवा प्रतिरोध यहै
भौंकै जहती काटै कम
हिन्दी वाला चंपू लेखक
दूरय सेनी चमकै चम.
© अमरेन्द्र अवधिया
फैजाबाद

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