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सोमवार, 21 सितंबर 2020

मातृभाषाओं के संकट पर लापरवाह रुख़ अखतियार करती संपर्क भाषा : हिंदी :: शैलेन्द्र कुमार शुक्ल




मातृभाषाओं के संकट पर लापरवाह रुख़ अखतियार करती संपर्क भाषा : हिंदी




© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल 

ईमेल- shailendrashukla.mgahv@gmail.com


भाषा की अस्मिता और उस पर उमड़ते संकट पर, भावुकता से बचते हुये जरूरी विचार विमर्श आवश्यक है। भावुकता से भाषा में वैचारिकता की क्षमता जाती रहती है। वैचारिकता विहीन भाषा एक गांठ बन कर रह जाती है जो अपनी प्रासंगिकता खो देती है। प्रत्येक भाषा को प्रसंगानुकूल अभिव्यक्ति की लोक-जनित-चेतनता अधिकारिणी शक्ति की नितांत आवश्यकता होती है, जिसमे जीवंतता निहित होती है। भाषा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष संवेदनशील ताकतों का होना आवश्यक है। यह पक्ष अमूर्त का प्रकटीकरण करता है। इसका संबंध मानुष विवेक से है, उसकी कोरी भावुकता से कतई नहीं। भाषा अपने समय, समाज और दर्शन को एक साथ लेकर चलती है। राजनीतिक प्रक्रियाओं के तहत भाषा का मानकीकरण भी होता है और राजश्र्य में उसका मौलिक परिशिष्ठ पीछे छूट जाता है। वह जितनी भव्य दिखती है उसकी स्वाभाविक अंगढ़ता जाती रहती है। इस स्वाभाविक अंगढ़ता के न रहने से उस भाषा की संस्कृति का असली चरित्र धूमिल हो जाता है, जिसका फायदा सत्ता के साज़िंदे उठा कर संस्कृतिवाद की नितांत झूठी अवधारणा प्रस्तुत करने में सफल हो जाते हैं। इस तरह मूल भाषा का स्वरूप पीछे छूट जाता है, और सत्ता के वशीभूत उसका शिष्ट व्याकरण साम्राज्यवादी हो उठता है यही हालात आज हिंदी के हैं।

कुछ जायज और संजीदा सवाल हमारे मन में कौंधते हैं कि 1857 याने भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष के पूर्व जहां से आधुनिकता की भारतीय परिकल्पना शुरू होती है, से पहले हिंदी कहाँ थी? क्या हिंदी अपनी बनावट के इतिहास से मुह मोड़ने में सफल हो जाएगी? क्या हिंदी अपने गले में बनावटी सभ्यताओं का शिष्ट फंदा डाल कर संस्कृत लोक में जा बसेगी? बहुल हिंदियों के घर में हिंदी की ठकुराई कब तक चलेगी? क्षेत्रीय हिंदियाँ कब तक इग्नोर की संस्कृति पर खून की जाती रहेंगी? क्या हिंदियों को खत्म कर देना हिंदी के साम्राज्यवादी मठाधीशों से संभव हो सकेगा? हिंदी के रक्त में शुद्धता की दावेदारी करने वाले क्या यह बताएंगे कि हिंदी का पहला कवि कौन है? क्या हिंदी सिर्फ सौ-सवा सौ साल पुरानी भाषा है? ध्यान से देखा जाये तो इन सवालों का जवाब मुझे भी आता है और आप को भी, बशर्ते आप इन सवालों को इग्नोर करने का धंधा सीख चुके हैं आप की झंडाबरदारी इन सवालों से डरती भी है यह सच है। आप का मतलब यहाँ हिन्दी के शुद्धतावादियों से है जो हिंदी के उत्थान पर भ्रम फैलाकर रोटी खाते हैं। 

सबसे पहले हमें हिंदियों और हिंदी के बीच फर्क समझ लेना चाहिए। हिंदी शब्द का प्राचीन प्रारूप आप यदि देखे तो समझ जाएंगे की कि हिंदी शब्द का प्रयोग बहुबचनात्मक रूप में होता था। प्रांत विशेष के लोगों के लिए। आज समझने के लिए हमारे पास और भी दूसरे उदाहरण हैं। जैसे पंजाब के लोगों को बाहर वाले आज भी पंजाबी कहते हैं। इसका मतलब वहाँ की जनता को हम पंजाबी कहते हैं यह उनकी ‘पहचान’ का शब्द है। उनके व्यवहार और साहित्य की भाषा भी पंजाबी जानी गई। यहाँ जो पंजाबी बनी वह कई पंजाबियों में से एक मानकीकृत है। इसे संस्कृत से भी समझ सकते हैं। संस्कृत अपने समय की एक मानकीकृत रूप में राजश्रित हो कर प्रतिष्ठित हुई उस समय हम जानना चाहें तो जानेंगे की कई संस्कृतें मानुष व्यापार में थीं। फिराक साहब को याद करते हुये विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस बात का जिक्र भी किया है। फिराक साहब यह मानते और जानते थे-                 

 “फिराक साहब केवल ऐसी ही बातें नहीं करते थे, दूसरी बातें भी करते थे जैसे एक बात पहले पहल उन्होंने ही मुझसे बताई है। एक दिन वे कहने लगे कि पाणिनी के जमाने में नब्बे संस्कृतियाँ चलती थीं और उसमें से एक को स्टैंडर्डाइज किया था पाणिनी ने। फिराक साहब संस्कृत को संस्कृतियाँ कहते थे। उनके कहने का मतलब था संस्कृतें। तो फिराक ने जब ये बात मुझे बताई तो मैं सुन रहा था लेकिन उनका चेहरा एकदम से बदल गया और बोले कि 'तुम तो बिल्कुल इंसेन्सेटिव आदमी हो। इतनी बड़ी बात मैं कह गया और तुम्हारे चेहरे पर कोई इमोशन ही नहीं आया। जब मैंने पहले पहल ये बात डा. ताराचंद के मुँह से सुनी थी तो मैं तो तीन दिन तक रक्स करता घूमा था।'”   

यहाँ जो नब्बे संस्कृतियों (संस्कृतें) फिराक साहब कह रहे हैं इसका मतलब उस समय बहुत सी और भी भाषाएँ थी जो जीती-जागती थी। संस्कृत सत्ता और शासन के लिए तैयार की गई भाषा थी, यह मानक रूप में लाई गई थी, जैसे तमाम हिंदियों के बीच से एक खड़ी को मानकीकृत कर हिंदी के रूप में सरकारी कामकाज के लिए उपयोगी बनाई गई। यह सिर्फ भारत में संस्कृत और हिंदी के साथ घटित होने वाली घटना नहीं है यह दुनिया के तमाम देशों की पुरानी भाषाओं के साथ यही हुआ है। इसे शुद्धतावादी सुन कर अपवित्रता महसूस कर सकते हैं। जिस समय संस्कृत का मानकीकृत रूप सामने आया तो इसका मतलब यह कतई नहीं हो सकता की दूसरी संस्कृतें सभ्यता के ठेकेदारों ने मिटा दी होंगी, या उनके बलबूते यह संभव हो सका हो । वह भी जीवित रहीं। पाली और प्राकृत इसके प्रमाण हैं। आज जिन्हें मैं हिंदियाँ कह रहा हूँ इनके प्राचीन रूप कभी फिराक की भाषा में नब्बे संस्कृतों में मौजूद थे। 

हिंदी साहित्य का मूल्यांकन भाषा के संदर्भ में करते हुए यदि देखें तो नवजागरण कालीन आधुनिकता में भाषा का प्रसंग अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारतेन्दु युग में हिंदी गद्य ने जो रुख अख़्तियार किया, उसे ही देखते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक काल को गद्यकाल कहा। इस काल की एक महत्वपूर्ण चिंता हिंदी के लिए एक मानक जो बड़े फ़लक पर दूरदर्शी और सुपाठ्य हो, गढ़ने की कोशिश की गई। आधुनिक काल के पूर्व में ब्रजभाषा, अवधी और मैथिली का व्यापक विस्तार था, इन भाषाओं में लिखा साहित्य उत्तर भारत में खूब लोकप्रिय था। ये मातृभाषाएँ व्यापक परिदृश्य में जानी और समझी जाती थीं, लेकिन इनमें गद्य का परिमार्जन कविता की तुलना में पीछे रह गया। आधुनिक संदर्भ में खड़ी बोली ने इसकी जगह पुष्ट कर ली। आचार्य शुक्ल लिखते हैं,-“साहित्य की रचना पद्य में ही होती रही। गद्य का विकास यदि होता आता तो विक्रम की शताब्दी के आरंभ में भाषा संबंधिनी बड़ी विषम समस्या उपस्थित न होती। जिस धड़ाके के साथ गद्य के लिए खड़ी बोली ले ली गई उस धड़ाके के साथ न ली जा सकती ।” खड़ी बोली को हिंदी बनाने की जो स्थिति बनी उसके पीछे यही कारण था, कि प्रचलित और स्थापित मात्रभाषाओं  के पास परिमार्जित और मानकीकृत गद्य न था, हालांकि इनके पास गद्य था ही नहीं ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन ये भाषाएँ मूलतः काव्याधर्मा थी। साहित्यिकता का ज़ोर गद्य पर नहीं था यह सच है, और आज भी इन भाषाओं के पास गद्य की स्थापित और परिमार्जित भाषा उस रूप में नहीं दिखती। बहुत कुछ विविधता लिए हुये इन भाषाओं में अब गद्य की रचनाएँ मिलती है, यह विविधता स्थानीयता में जीवंतता का गुण लिए होती है। व्यवहारिक पक्ष यदि देखें तो बोल चाल के गद्य की कोई कमी कभी भी इन भाषाओं में नहीं थी। बहरहाल तमाम हिंदियों-अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, बुन्देली, राजस्थानी, पहाड़ी के बीच से एक खड़ी बोली को हिंदी संपर्क भाषा के रूप में गद्य के परिमार्जन को देखते हुये ठीक कर लिया गया। अब हिंदी राज-काज की भाषा की प्रतिष्ठा पा कर आगे बढ़ती चली गई। इसका मतलब यह कतई नहीं समझना चाहिए दूसरी हिंदियाँ या मातृभाषाएँ साहित्य सृजन के योग्य न बची। वास्तव में साहित्य की योग्यता मानकीकृत भाषा में होती ही नहीं है उसमें लिखी गयी रचनाएँ मातृभाषा से ही शक्ति ग्रहण कर कुछ मजबूत हो सकती हैं। भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में रचे गए मानकीकृत भाषा के साहित्य को देख कर इसे पुष्ट कर सकते हैं। अमेरिकन आलोचक रेने वेलक (Rene Wellek) इस विषय में महत्वपूर्ण तथ्यों की उधेड़बुन करते हुये अपना मत रखते हैं-“वैज्ञानिक भाषा की तुलना में साहित्यिक भाषा कुछ अर्थों में त्रुटिपूर्ण मालूम होगी। इसमे तमाम अस्पष्टताएं भरी रहती हैं; किसी भी अन्य ऐतिहासिक भाषा की तरह यह अनेकार्थी शब्दों से व्याकरण में लिंग जैसी मनमानी और तर्कहीन श्रेणियों से भरी होती है। यह ऐतिहासिक संयोगों, स्मृतियों और सहचर्यों से ओतप्रोत होती है। एक शब्द में कहें तो नितांत ‘व्यंजनात्मक’ होती है। इसके अतिरिक्त साहित्यिक भाषा मात्र अभिधात्मक तो होती ही नहीं है।” रेने वेलेक बहुत ही गंभीर साहित्य चिंतक है। उसने भाषा के महत्वपूर्ण भेदों-साहित्यिक भाषा, रोज़मर्रा की भाषा और वैज्ञानिक भाषा  पर व्यापक चर्चा की है। भारत की भाषा समस्या के संदर्भ में इसे समझना लाभदायक लगता है। उसने साहित्यिक भाषा को रोज़मर्रा की भाषा के करीब बताया है बल्कि वैज्ञानिक याने संपर्क की मानक भाषा इससे बहुत अलग है, जिसे वह साहित्य के लिए अयोग्य बताता है उसके तर्क तथ्यात्मक हैं। उसकी मान्यताएँ वैज्ञानिक है, वह आगे कहता है-“साहित्यिक भाषा, भाषा की  ऐतिहासिक संरचना से बहुत अधिक ग्रस्त रहती है; यह स्वयं चिन्ह,अर्थात शब्द की विशेषता पर बल देती है; इसका अपना ही व्यंजनात्मक और तथ्यात्मक पक्ष होता है जिसे व्यज्ञानिक भाषा यथासंभव कम करना चाहेगी।”                                                     

दरअसल यदि हम गंभीरता से देखें तो मानकीकृत वैज्ञानिक भाषा  साहित्यिक सृजन के योग्य हो ही नहीं सकती। हिंदी के नाम पर पर जो ‘एक भाषा’ का सिद्धांत अपना लिया गया, वह निरी मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है। साहित्य आधुनिक काल से पूर्व जिन भाषाओं में सृजित होता था, उन्हीं भाषाओं में आज भी होता है बस परिवर्तन गद्य के नाते खड़ी बोली हिंदी के मानक ढांचे में फिट कर दिया जाता है। स्थानीयता ही साहित्यिक भाषा की जान होती है और यह मानक या वैज्ञानिक नहीं हो सकती है वहाँ विविधता जीवंतता का गुण बनती है। हिंदी वालों ने अपनी अकादमिक सुरक्षा और कुत्सित अभिजात्यवादी मोह के कारण हिंदी को एकात्मक बना कर खुद को सुविधाभोगी होने की सफलता अर्जित कर ली है। वह आज तमाम-तमाम हिंदियों को साहित्य के मठों और मंदिरों से निकाल कर खड़ी बोली हिंदी की वकालत करते हैं। वह इन हिंदियों को खत्म करने की नाकाम सरकारी कोशिश कर रहे हैं। एक खड़ी बोली हिंदी यदि संविधान की अष्टम अनुसूची में दर्ज है तो दूसरी हिंदियाँ क्यों नहीं, यदि हिंदी एक भाषा है तो अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुन्देली, कन्नौजी, राजस्थानी, पहाड़ी आदि सभी स्वतंत्र भाषाएँ हैं। उनकी यदि हिंदी में जगह नहीं, तो वह हिंदी की परवाह क्यों करें। यह राजनीतिक सवाल हैं जिनका समाजिकता से गहरा जुड़ाव है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन मातृभाषाओं के महत्व को स्वीकारते हुये हिंदी के अभिजात्यवादी मानसिकता के रोगियों को फटकारते हुये लिखते हैं-“देश के पुनर्निर्माण तथा हमारी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को शीघ्रता से हल करने के लिए मातृभाषाओं का कितना महत्व है, अभी इसकी तरफ हमारे भाग्यविधताओं का ध्यान बिलकुल गया ही नहीं है। कितनी ही औंधी खोपड़ियाँ तो यह स्वीकार करने के लिए भी तैयार नहीं हैं कि मारवाड़ी, मेवाड़ी, हरियाणी, बुन्देली, भोजपुरी, मगही, कुमाऊनी, गढ़वाली आदि भाषाएँ भी अपना अस्तित्व रखती हैं। करोड़-करोड़ आदमियों द्वारा बोली जाने वाली इन भाषाओं को कितने ही लोग ‘बोली’ कहकर छुट्टी ले लेना चाहते हैं, और इसे समझने की आवश्यकता ही नहीं महसूस करते कि ये जीवित भाषाएँ हैं, और अपने क्षेत्र में जनता के अंतस्तल तक को छूने के लिए उनका सहारा लेना आवश्यक है। अवधी, ब्रज या मैथिली को तुलसीदास, सूरदास और विद्यापति के कारण भुलाया नहीं जा सकता, किन्तु मालवी मगही आदि का कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता, इसलिए उनके अस्तित्व को स्वीकारने की आवश्यकता नहीं समझी जाती।” राहुल जी का यह विचार दूरगामी सफल परिणामों का द्योतक है। लेकिन इस पर आज भी विचार नहीं किया गया। ‘एक भाषा एक राष्ट्र’ के अभिजन पैरोकारों ने हिंदी पट्टी की संकुुुचित मानसिकता से पूरे देश में गंध मचा दी। ये हिंदी को मानकीकृत अपने पूर्वग्रह में करते रहे जिससे हिंदी की संपर्क भाषा की नीति भी सफल न हो सकी, उसका विरोध भी खूब हुआ। उन्होंने हिंदी को उर्दू याने हिंदुस्तानी से बचाने के लिए दिन-रात एक कर साजिशें रचीं, हिंदी को आगे चल कर वह संस्कृत की पूंछ में बांधने में सफल भी हुये। हिंदी आज यदि सम्पूर्ण भारत की संपर्क भाषा नहीं है तो इन्हीं शुद्धतावादियों की दुर्नीतियों की वजह से। हिंदी का सबसे ज्यादा नुकसान हिंदीवादियों ने किया है। ये हिंदीवादी भारतेन्दु और द्विवेदी युग में खड़ी बोली में छपी रचनाओं को देख कर, यह प्रचारित किया करते थे कि देखो यह हिंदी है और असली हिंदी अब तक लिखी ही नहीं गई थी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास से यह तथ्य देखिये- “ ‘खड़ी-बोली पद्य’ का झण्डा लेकर घूमने वाले स्वर्गीय बाबू अयोध्याप्रसाद खत्री चारों ओर घूम-घूम कर यह  यह कहा करते थे कि अभी हिंदी में कविता हुई कहाँ, सूर, तुलसी, बिहारी आदि ने जिसमें कविता की है वह तो ‘भाखा’ है हिंदी नहीं। संभव है इस सड़े-गले खयाल को लिए अब भी कुछ लोग पड़े हों।” 

  इन्होंने खड़ी बोली से जिस मानक को राज-काज के लिए फिट किया था, उसे साहित्य के लिए अनिवार्य बनाने की भरसक कोशिश में लगे थे। उन्हें वही शुद्धता की मानक उम्मीद साहित्य से भी थी। आगे चल कर साहित्य की दुनिया में इन्हीं हिंदीवालों की कब्जेदारी कायम हुई, जिन्होंने अवधी, ब्रजी, भोजपुरी, मैथिली, कन्नौजी, बुन्देली, राजस्थानी और पहाड़ी भाषाओं को मुख्य धारा से पीछे फेक दिया। वह इन्हें बड़े आराम से हिंदी की बोली कह कर कमतर आँका करते हैं। दरअसल ये हिंदी वाले हिंदी के हित में बिलकुल नहीं हैं, ये हिंदी के कट्टर नौकरशाह है, जो सरकारों की दलाली में मातृभाषाओं की हलाली करते हैं। इसमें इनके स्वार्थ चिपके हुये हैं, और अहंकारी अभिमान भरा हुआ है कि साहित्य की बाजार में जो धंधा हमारा चल रहा उसमें कोई दूसरा न आ जाए, ज्ञानपीठ लूटें तो हम, साहित्य अकादमी मिले तो हमको, हिंदी प्रतिनिधि बन कर सरकारी मजा सिर्फ हम मारें, उसके अधिकारी भोजपुरी वाले क्यों हो गए,अवधी पर तो हमने तुलसी के बाद ताला लगा दिया अब उसमें कोई कुछ नहीं लिखा सकता, अगर लिखेगा तो हम उसकी नोटिस ही नहीं लेंगे। यही हालात सारी मातृभाषाओं के साथ हिंदी वालों ने की। संविधान की अष्टम अनुसूची में भोजपुरी को सामील कराने के लिए भोजपुरिए अपनी आवाज उठा रहे हैं, इस बात को लेकर खाये-पिए-अघाए हिंदी के नौकरशाह डरे हुये हैं। उनके आधिपत्य के सिंहासन डोल रहे हैं कि हिंदी से भोजपुरी निकल जाएगी, हमारा बाजार कम हो जाएगा। मतलब उनका बाजार न बिगड़े भोजपुरी खत्म हो जाए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हिंदी के इन भाटों से यह पूछना चाहिए, कि क्या भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में सामील होते ही भोजपुरिए हिंदी भूल जाएंगे, हिंदी की जरूरत इनको नहीं रहेगी, क्या संपर्क भाषा पर तुमको कोई भरोसा नहीं? 

हिंदी की परवाह करने वालों को हिंदी की उपयोगिता पूरे देश में सिद्ध करनी चाहिए, उसे समूचे देश की संपर्क भाषा बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि अपनी ही मातृभाषाओं का गला रेत कर इग्नोर की राजनीति करनी चाहिए। हिंदी पट्टी की मातृभाषाओं के संवैधानिक होने से हिंदी का विस्तार होगा, वह संपर्क भाषा होने का असली अर्थ समझ सकेगी। राहुल जी ने इस पर पहली बार गंभीरता से विचार किया और निष्कर्ष निकाले। उन्होंने रूस का हवाला देते हुये महत्वपूर्ण तथ्यों को रेखांकित किया है कि रूस ने अपनी मात्रभाषाओं को शिक्षा का माध्यम बना कर किस तरह बहुल शिक्षित जनता का स्वप्न कम से कम समय में साकार किया। वह इस तरह की व्यापक व्यवस्था भारत में भी लागू करने की हिमायत करते हैं। उनके विचार आज कितने प्रासंगिक हैं इसका प्रमाण देखा जा सकता है। इसमे हिंदी का एक व्यापक निहितार्थ सफल होगा और हिंदी अपना सही अर्थ पा सकेगी। वह कहते हैं-“इसमें कोई कमुनिज़्म गंध नहीं है, न मात्रभाषाओं के माध्यम स्वीकार करके हम कोई महापाप करेंगे। निरक्षरता की समस्या को तुरंत खतम करने का यही एक रास्ता है। हमें प्रौढ़ों की शिक्षा और प्राइमरी के चार साल की शिक्षा को मातृभाषाओं में कर देना चाहिए, चौथे वर्ष चाहें तो तीसरे ही वर्ष में हम हिंदी शिक्षा को भी द्वितीय भाषा के तौर पर रख सकते हैं, और प्रारम्भिक अनिवार्य शिक्षा के बाद आज की तरह ही पूर्णिया से जैसलमेर, हिमशिखरों से छत्तीसगढ़-नीमाड़ तक हिंदी को माध्यम बनाए रख सकते हैं। इस प्रकार जहां तक माध्यमिक, उच्च माध्यमिक या उच्च शिक्षा का संबंध है, हिंदी का अपना स्थान अक्षुण्ण रहेगा, और ऐतिहासिक कारणों से हिंदी ने भारत के जो इतने बड़े भूभाग को एकता बद्ध कर दिया है, उसमें भी कोई बाधा नहीं पड़ेगी, बल्कि नवीन भारत में अपने-अपने प्रदेशों में वहाँ की भाषाओं के सर्वे-सर्वापन को कायम रखते, हिंदी सारे भारत वर्ष में व्यवहार की जाने वाली भाषा बन कर हमारे सारे देश की एकता को दृढ़ करेगी।” हिंदी से देश को इस दृढ़ता की उम्मीद थी लेकिन भारत के भाग्यविधताओं के पिछलगुओं ने इसे साकार नहीं होने दिया। हिंदी के कुछ प्रोफ़ेसर इसका ज़ोर-शोर से विरोध करते थे। हिंदी की इन दुर्नीतियों का फायदा अंग्रेजी ने खूब उठाया जिसका परिणाम हमारे सामने है। वह इनकी पोल खोलते हुये फिर लिखते हैं, “यह आकाश-बेलें अब भी दिल से अंग्रेजी को ही हमारे स्वतंत्र देश की भाषा बनाये रखना चाहते हैं, तभी तो यूरोपियन स्कूलों और कानवेंटों में लड़के-लड़कियों की भरमार देखी जाती है। भला अपने सात पीढ़ी तक के लिए इंतजाम कर जाने पर उतारू लोग, अंग्रेजी को सिंहसंच्युत करके हिंदी को कैसे शासन-यंत्र के भीतर घुसने देंगे, और मातृभाषाओं की बात भी सुनने पर क्यों नहीं कान पर उंगली रखेंगे? आकाश-बेलों का शासन राष्ट्र के लिए सचमुच ही भारी अभिशाप है। उनका अपना एक छोटा सा अंडे का खोल होता है, जिसके भीतर गूलर के कीड़े की तरह वह सारी दुनिया समझते हैं। लेकिन मात्रभाषाएं अधिक दिनों तक उपेक्षित नहीं रह सकतीं।” आज तक यही स्थिति हिंदी की बनी हुई है, हिंदी की वकालत करने वाले हिंदी को संस्कृत लोक तक पहुंचाने के सारे रास्ते खोलने में लगे हैं, वह हिंदी से लोक-भाषिकता को शुद्धता के आधार पर खारिज कर मातृभाषाओं का ठिकाने लगाने की चाल चल रहे हैं। वह भाषा के साम्राज्यवादी ठेकेदार हैं जो हिंदी में हिंदियों की कोई परवाह नहीं करते। उन्हें सिर्फ वह सर उठाती हिंदियों की तरफ अपनी कुंठा के गोठिल हथियार लेकर ललकारते रहते हैं। हिंदी अगर पूरे भारत की संपर्क भाषा बन पाती और राष्ट्र भाषा के स्वप्न साकार करती तो हिंदियों में अवधी, भोजपुरी, मैथिली, ब्रजी आदि ही नहीं पंजाबी, मराठी के साथ-साथ बंगला और तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम, उड़िया समेत सभी भारतीय भाषाएँ  होतीं और हिंदी ‘भारतीय-भाषा’ होने का सही अर्थ पा जाती। इस तरफ हिंदी वादियों ने कभी सोचा ही नहीं, उनकी स्वार्थ लोलुपता हिंदी यदि राष्ट्र भाषा बने तो कौन सी हिंदी ? वह इसी में पूर्वग्रह के शिकार हो कांव-कांव करते रहते हैं। वह हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए नहीं उसे उत्तर-मध्य भारत के सीमित क्षेत्र से बांध कर ही देखते हैं, और वहाँ की मातृभाषाओं पर हिंदी की ठकुराई चला कर उन्हें सर उठाने पर पाबंदी लगते हैं। आज हिंदी को यह ‘हिंदीवादी’ जिस रास्ते पर लेकर चले हैं उससे लगता है हिंदी के दुर्दिन उसे स्वर्गीयता का कट्टर कफन पहना कर देवताओं की भाषा बना कर ही मानेगे। वह हिंदी की तानाशाही में हिंदियों को सुकून की सांस नहीं लेने देंगे। एक और उद्धरण देखिये मीर तकी मीर (1723-1810) यह भी हिंदी का शायर या कवि है, इसका दुख तमाम-तमाम हिंदियों का दर्द है- 

क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सुरूरे-क़ल्ब

आया नहीं ये लफ़्ज़ तो हिंदी ज़ुबाँ के बीच                                                                    

जो यह कहता है सुकून की सांस लेना हिंदी के शब्दकोश में ही नहीं सामील है। इसके दर्द को कौन समझेगा। हिंदी वालों ने इससे ‘हिंदी’ शब्द छीन कर और धक्के दे कर धकेल दिया, और नाम दिया यह तो उर्दू का शायर है। यह है हिंदीवादियों की संकुचनशीलता। 

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि हिंदी के सच्चे साहित्यिकों को यह समझ लेना चाहिए कि हिंदी एक संपर्क भाषा है, उसका विस्तार सम्पूर्ण भारत देश में होना चाहिए, न कि उत्तर और मध्य देश कि मातृभाषाओं को मार उसे एक स्थानीय भाषा बन जाने पर मजबूर होना पड़े। वह कोई मातृभाषा नहीं कि उसके भाषी कम हो जाएंगे अगर किसी मातृभाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में सामील कर लिया जाएगा। हिंदी को एक राष्ट्र भाषा के रूप में विस्तार दीजिये, उसमें सम्पूर्ण भारत की भाषाओं का प्रतिनिद्धित्व होना चाहिए, जो कि हिंदी की असली अस्मिता है। हिंदी के साम्राज्यवादियों से हिंदी को ज़ोर देकर बचाना होगा, नहीं तो वह समय दूर नहीं जब हिंदी के पहले महाकवि चंदवरदाई नहीं हरिऔध कहे जाएंगे।   

(यह लेख संदर्भ सूची के साथ वीक्षा पत्रिका में प्रकाशित है)


                                                               

                 

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