बापू द्याखौ आवा बसन्तु
सोचित मनई अब रही कहाँ चौगिरदा डटे लफंगा हैं
घर के भीतर घर के बाहर सब गांव सहर मा दंगा हैं
सब डहुँकि रहे हैं सड़वा अस खेतन मा फरी उदासी है
भूखे हैं पेट गरिबवन के खेती चरिगे सन्यासी हैं
दुखिया सुलगति हैं कंडा अस न ढूंढ़े पावै आदि अंतु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
अब सत्य मरति है मौके पर बेड़िन मा कसी अहिंसा है
बाजार गरम है झूठ क्यार साहेब की बड़ी प्रसंसा है
का है मजाल जो बोलि देइ साहेब यह नीति नीकि नाहीं
घामे मा तपिगे रामगुनी चाकर चिहुँकैं छाहीं छाहीं
जल्लाद बनाये फंदा है फांसी देई कहिका महन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
वै चुरुवा भरि पानी ढूंढ़इं बूड़ै का जिनका नहीं ठौर
आगी मुतति माहिल होरे बगुला भगतन का करौ गौर
जिनकी अब पुलिस मलेटरी है वै सब कायर बलवान भये
बप्पा का पहिले दागि दिहिन अम्मा के ठेकेदार भये
जय ब्वालौ भारत माता की चिंघारि रहा है नवा सन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
बेकार जवानी हुइगै है बुढ़वन की मरगति बिगरि गई
हैं नीति परायण महाराज उनकी सद्गति लौ संभरि गई
लरिका सब भये कुपोषित है कक्का उनके सरताज भये
जिनके मन तनकिउ दया नहीं उइ धरम के पहरेदार भये
हमते तुम फिरि फिरि पुछेउ ना यहु विश्वगुरु है कौन जन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
कन्फूजन तुमका भले होय ई तौ सूधै निर्णायक हैं
काटौ तौ निकरै खून नहीं यै हिंसा मा सब लायक हैं
माघै मा फागु मचाय देइं इनके भेड़हा हैं सांति दूत
बखरी मा भरा अँधेरु खूब यै सोधि रहे हैं नवा भूत
बघवा छेगरी का पोटि रहा कहि रहा बनति है बनाबन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
सब लुच्चा लिंचिंग करति हियाँ सरगना बकैती छाँटति है
जिन के बल पर सरदार भये उकना भीतर ते बाँटति है
लाठी भांजति है पुलिस खूब सह पावति खूब लफंगा हैं
मनई की कौनिउ खैर नहीं सगरे बदमसवा चंगा हैं
लौंडा लहराय रहे कट्टा थर्राय रहे हैं दिग दिगन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
सोचित मनई अब रही कहाँ चौगिरदा डटे लफंगा हैं
घर के भीतर घर के बाहर सब गांव सहर मा दंगा हैं
सब डहुँकि रहे हैं सड़वा अस खेतन मा फरी उदासी है
भूखे हैं पेट गरिबवन के खेती चरिगे सन्यासी हैं
दुखिया सुलगति हैं कंडा अस न ढूंढ़े पावै आदि अंतु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
अब सत्य मरति है मौके पर बेड़िन मा कसी अहिंसा है
बाजार गरम है झूठ क्यार साहेब की बड़ी प्रसंसा है
का है मजाल जो बोलि देइ साहेब यह नीति नीकि नाहीं
घामे मा तपिगे रामगुनी चाकर चिहुँकैं छाहीं छाहीं
जल्लाद बनाये फंदा है फांसी देई कहिका महन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
वै चुरुवा भरि पानी ढूंढ़इं बूड़ै का जिनका नहीं ठौर
आगी मुतति माहिल होरे बगुला भगतन का करौ गौर
जिनकी अब पुलिस मलेटरी है वै सब कायर बलवान भये
बप्पा का पहिले दागि दिहिन अम्मा के ठेकेदार भये
जय ब्वालौ भारत माता की चिंघारि रहा है नवा सन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
बेकार जवानी हुइगै है बुढ़वन की मरगति बिगरि गई
हैं नीति परायण महाराज उनकी सद्गति लौ संभरि गई
लरिका सब भये कुपोषित है कक्का उनके सरताज भये
जिनके मन तनकिउ दया नहीं उइ धरम के पहरेदार भये
हमते तुम फिरि फिरि पुछेउ ना यहु विश्वगुरु है कौन जन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
कन्फूजन तुमका भले होय ई तौ सूधै निर्णायक हैं
काटौ तौ निकरै खून नहीं यै हिंसा मा सब लायक हैं
माघै मा फागु मचाय देइं इनके भेड़हा हैं सांति दूत
बखरी मा भरा अँधेरु खूब यै सोधि रहे हैं नवा भूत
बघवा छेगरी का पोटि रहा कहि रहा बनति है बनाबन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
सब लुच्चा लिंचिंग करति हियाँ सरगना बकैती छाँटति है
जिन के बल पर सरदार भये उकना भीतर ते बाँटति है
लाठी भांजति है पुलिस खूब सह पावति खूब लफंगा हैं
मनई की कौनिउ खैर नहीं सगरे बदमसवा चंगा हैं
लौंडा लहराय रहे कट्टा थर्राय रहे हैं दिग दिगन्तु
बापू द्याखौ आवा बसन्तु।
© शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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