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सोमवार, 17 जुलाई 2017

कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल


(तस्वीर अमरेन्द्रनाथ अवधिया के सौजन्य से प्राप्त)


कूप-मंडूक अवधियों के नाम एक वक्तव्य

गो-रक्षा आंदोलन और आधुनिक हिंदी का उद्भव एक ही राजनीति एजेंडे के रूप में हमारे सामने आया। गो माता की तरह हिंदी माता के भी महिमा मंडन की प्रक्रिया एक साथ राजनीतिक तौर पर तेज होती गई। उस समय भी अवधिये सबसे ज्यादा कन्फ़्यूज्ड थे- प्रतापनारायण मिश्र इसके उदाहरण है और प्रताप-लहरी इसकी गवाह है। हिंदी-हिन्दू-हिंदुस्तान इन्हीं का दिया हुआ नारा है। इन्होंने भी दोनों को साधने की पूरी साधना की है। हिंदी जिन रूपों में मानकीकृत हो कर आई, उस पर महत्वपूर्ण शोध फेंचेसिका आर्सेनी, वसुधा डालमिया और आलोक राय आदि ने तर्क संगत काम किया है। अवधियों की गत न्यारी ही रही है, उनके पास जायसी हैं, तुलसी है, रहीम हैं माने वही ही गौरव और गर्व के केंद्र में थे। तो उनको अब कोई परवाह नहीं, क्योंकि उनके पास गौरवशाली पुरखे हैं। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा अरे हम क्या कर रहे हैं, रीतिकाल भर तुम क्या कर रहे थे, आधुनिक युग में पढ़ीस से पूर्व तुमने क्या किया। यह सब उनके सोचने का विषय कभी नहीं रहा। तुम भी सत्ता का राग उसी की भाषा में गा रहे थे और चाटुकारिता कर रहे थे, यह कब तक छुपाओगे! पढ़ीस के बाद नई लीक अवधी में पड़ी लेकिन उस पर अवधी का कौन कवि चला यह किसी से छुपा नहीं। अवधिये अपने पुरातन घमंड में चूर मानस पर कर्मकांड करते रहे और अब अवधी के उद्धार के लिए अवधी होटल खोलने की तैयारी में लगे हैं और अवधी की तीर्थ यात्राएं चालू हैं, और जीवित भाषा की तेरहीं मना कर पोथन्ने छापे जा रहे हैं।
            आज भी सबसे ज्यादा अवधी वाले ही कन्फ़्यूज्ड हैं। जब भोजपुरी ने अपनी आवाज उठाई और उससे पहले भी तमाम विसंगतियों के बावजूद जब भोजपुरी बाजार में डिंकने लगी तो स्वनामधन्य अवधिये नींद से जागे तब तक उन्हें नहीं पता था कि अवधी पीछे छूट रही है। खैर, यह भी गज़ब की बात है की अवधियों की नब्बे फीसदी आबादी यह जानती ही नहीं कि वह जो भाषा बोलती है उसका नाम क्या है। और बाकी के अवधिये धार्मिक और सांप्रदायिक कामों में व्यस्त थे, बचे प्रगतिशील लोग तो उनको अपनी बौद्धिकता प्रमाणित करने में अवधी की बात कर के गंवार थोड़ी न होना था। यह राम कहानी है अवधी की। गाँव देहात से जो तनिक भी पढ़ लिख कर या बिना पढ़े-लिखे भी थोड़ा बाबूगिरी टाइप कुछ शहर में मिल गया तो उनके घर में अवधी प्रतिबंधित हो जाती है या घ्रणा की वस्तु समझी जाती रही है। बाकी देहात में भी यदि घर से बाहर सड़क पर पाँव निकाल लिए तो अवधी बोलने में देहातीपन का बड़ा भारी बट्टा लग जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भी इस तरह का एक वाकया जो लखनवी मित्र के साथ सांची का स्तूप देखने गये थे, कभी भुला नहीं पाये नहीं। महुए का नाम जानने से बाबू पन में भारी बट्टा लग जाता है। इस तरह अवधियों ने बहुत दिनों तक यह जाना और समझा ही नहीं कि अवधी भी अभिमान की विषयवस्तु है, खैर भोपुरियों का शुक्रिया कि इन्हें ईर्ष्या करने के लिए जगा लिया।
            इधर बीच जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए भोजपुरियों ने साहित्य से लेकर राजनीति तक आवाज उठाई तो साहित्य के स्वनामधन्य नेताओं ने सोचा कि यह क्या, अब इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, ये कौन मनुज हैं जो हमारा आसान छीनने के लिये तप करने लगे हैं। डर भयानक था । उधर कलकत्ता से एक आहात आवाज सुनाई पड़ी त्राहिमाम .....त्राहिमाम । बचाओ प्रभू , बचाओ, अगर सरकार हाकिम ने कहीं भोजपुरी को अनुसूची में शामिल कर लिया, तो हम हिंदी वालों का धंधा कैसे चलेगा, हमारी बाबूगिरी का क्या होगा, हमारे कस्टमर कम हो जाएंगे! हम बर्बाद हो जाएंगे! इस तरह आहात होकर देवतुल्य आचार्य श्री...श्री....108 डॉ. अमरनाथ जी ने हिंदी के अश्वमेघ यज्ञ के आयोजन के लिये गुहार लगाई। और अपनी साम्राज्यवादी शक्तियों को संगठित कर हिंदी को फिर गोरक्षा आंदोलन की याद दिलाई। इस तरह हिंदी के साम्राज्यवादी अश्वमेधीय घोड़े कलकत्ता दिल्ली से होते हुये अवध में आये। मजे की बात यह भी कि इधर फिर से गोरक्षा आंदोलन जब से ज़ोर पकड़ा है तभी से हिंदी बचाओ अभियान भी कुंलांचे भरता हुआ, चिल्लाता हुआ, चीखता हुआ सामने आ ही गया। असल में दोनों का चरित्र एक ही है।
            तो यह बात मैं खास कर अवधियों के लिये ही कह रहा हूँ , उधर ही आता हूँ। डॉ. अमरनाथ जी ने जब हिंदी बचाओ मंच नामक संप्रदाय खोला तो उसमें सबसे ज्यादा अवधिये ही शामिल हुये। उनकी ईर्ष्या ज़ोर मार रही थी, हमारे पुरखे तो हाथी पालते थे, हमारे बाबा घोड़े से चलते थे आदि ...आदि। लेकिन इन्हें यह खयाल कभी नहीं आया कि हमारी जान तो कुकुर को एक कौर डालने में भी निकलने लगती है, हमने क्या किया, इसकी कोई परवाह नहीं। हिंदी के साहित्यिक घराने में कुछ अवधी जाति के नागरिक हैं जिन्हें अपनी पैदाइश पर बड़ा फ़क्र है। यह विश्वविद्यालयाओं में भी हैं और प्राइमरी स्कूलों में भी। भोजपुरियों को देख इनको भी राजनीति सूझी। तो दो रास्ते नजर आए - या तो अवधी बिना प्रयास के संविधान की अनुसूची में शामिल हो जाए और हम लोग अवधी अकादमी के अध्यक्ष बने फिर अपने चाटुकारों को पुरस्कार बांटें, फंड दें, अवधी होटल खोलें , भंडारा करें और पोथन्ना छापें। और दूसरा रास्ता यह कि भोजपुरी के खिलाफ खड़े होकर हिंदी बचाओ मंच से जुड़ें और भोजपुरी को अनुसूची में शामिल ही न होने दें। तब मामला बराबर। अवधिये बहुत कन्फ़्यूज्ड हैं। इधर अवधी प्रेम भी प्रदर्शित कर देते हैं और उधर हिंदी बचाओ मंच के उद्धारक देवताओं की पालकी भी ढो रहे हैं। मैं तो कहता हूँ तुम धन्य हो अवधियों ! तुम्हारे कन्फ़्यूजन को धिक्कार है !
            आज अवधी के स्वाभाविक और हिम्मती साथी अमरेन्द्रनाथ त्रिपाठी जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर मुझे टैग की। पोस्ट देख कर मैंने फिर माथा पकड़ लिया। कोई राकेश पाण्डेय है, अपने को अवधिया मानते हैं । हिंदी को बचाने के लिए और भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल न किया जाय , इसलिये हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, ऊपर पत्र में मोदी जी से गुहार लगाई गई है, बाकायदा। राकेश जी जैसे अवधी भाषी आप को बहुत से मिल जायेंगे। ये अवधी की बात करते हैं, संस्कृति को मेनटेन करने के लिये विविध आयोजन किया करते हैं। दरअसल इन चीजों से इनका कोई सरोकार नहीं है, ये वर्ग संघर्ष में दूसरे वर्ग से आते हैं -“उयि अउर आहि हम और आन” । इनके पास खूब पैसा है, अच्छी नौकरी है, बच्चे कनवेंट स्कूलों में सालाना लाखों रुपयों की फीस पर पढ़ते हैं, बड़े-बड़े शहरों में अच्छे मुहल्लों में घर हैं इनके। बस थोड़ा इज्जत और शोहरत के लिये देश प्रेम, लोक-प्रेम, भाषा-प्रेम(विद्वता प्रदर्शन के लिये), साहित्य प्रेम, संस्कृति प्रेम का प्रदर्शन कर लेते हैं। ये ऐसे योद्धा हैं जो ठेके पर आंदोलन चलवाते हैं, छठे-छमहे कल्चरल प्रोग्राम करवा देते हैं, सत्ताधारी नेताओं से मिल कर सौ बार चरण बन्दना करते हैं, और सांप्रदायिक दंगों से लेकर मंदिर निर्माण हेतु चंदा देते हैं, और जाहिल इतने कि लाल हरे नगों वाली अंगूठियों से लेकर  लाल-काले कपड़ों में लपटे पंडों और मुल्लाओं की भभूत देह पर सुविधानुसार बांधे रहते हैं। इनकी मूर्खता जग जाहीर है। और एक बात तो छूट ही गई इनकी सबसे बड़ी पहचान यह कविता के बहुत भारी रसिक होते हैं। तो इनके लिये राकेश रंजन की दो पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं-
तुमरी जय जय कार सुअरवा
तुमको है धिक्कार सुअरवा।

(नोट: बोली और भाषा संबंधी उलझाने, अवधी और भोजपुरी और मातृभाषाओं संबंधी समस्याएँ, हिंदी की नाजुकख्याली याने मातृभाषाओं के सर उठाते ही मरने का डर, हिंदी की राष्ट्रवादी नियति, भाषा-गत राजनीति और डॉ. अमरनाथ संबंधी हिंदी बचाओ मंच पर उधेड़बुन, भोजपुरी और संविधान कीअष्टम अनुसूची जैसे कुछ मुद्दों पर सुनीति कुमार चटर्जी, किशोरीदास बाजपेई, राहुल सांकृत्यायन, रामविलास शर्मा, फ़्रांचेसिका आर्सेनी, वसुधा डालमिया, आलोक राय, फिराक गोरखपुरी आदि विद्वानों के हवाले से एक शोध-आलेख “मातृभाषाओं के प्रति लापरवाह रुख अख़्तियार करती : संपर्क भाषा हिंदी” साखी पत्रिका में प्रकाशन हेतु लंबित, आते ही आप के समक्ष रखने का वचन देता हूँ। धन्यवाद ! – शैलेन्द्र कुमार शुक्ल)                                                                                                  

-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल 

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