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सोमवार, 7 दिसंबर 2020



"सर्वेश त्रिपाठी संस्कृत, फारसी कबिता कै के खूब प्रतिष्ठा पावै वाले जवान अहैं। हिंदी मा गीत लिखत अहैं औ मंचन पै सम्मान पावत अहैं/ इनके प्रसंसक इनका दक्षिणपंथी जिन आदर्सन पै मानत रहैं, अवधी की यइ कविता उनके मन का विचलित कै देती आहैं। मातृभाषा मा मनुष्य का असिली स्वभाव होत अहै, कोई बेईमानी नाय चलत।– "- संपादक 

1. 

बड़बोली कै भोंपू लै के सबका गद्दर कइ डारेव हो !

बड़ा बखद्दर कइ डारेव हो !


हिंदी का उर्दुस लड़वायेव

अवधी का घामेम दौरायेव

भोजपुरी का नङ्गा कइ के

कर्रेस पइसा ख़ूब कमायेव

बोलि बोलि के आपन रेशम गांधिक खद्दर कइ डारेव हो!

बड़ा बखद्दर कइ डारेव हो !


मुसलमान हिन्दुक दउरावैं

हिन्दू उनका लट्ठ देखावैं

भगवा हरियर नीला पीला

यकदुसरे का ताव देखावैं

अँधियारेन मा नीक रहेन हम फर्जी उज्जर कइ डारेव हो!

बड़ा बखद्दर कइ डारेव हो !


तुमरे प्रगतिशील झण्डा कै

डण्डा सबके घुसरि गवा है

कबिता मा नफ़रत भरि गै है

हर मनई अब गरम तवा है

बरसि किसानन के छपरा पर फटहा चद्दर कइ डारेव हो!

बड़ा बखद्दर कइ डारेव हो !


लेकिन कब तक खैर मनइहौ

यकदिन तू दउरावा जइहउ

हँसिया खुरपा सटक गये तौ

सुनि लेव बेटा राह न पइहउ

सरम नाय आवत है तुमका जीभ छछुन्दर कइ डारेव हो!

बड़ा बखद्दर कइ डारेव हो !

       

2. 

देखव ! कबिजी अल्लाय रहे


अपने हाथेक पगहा कीन्हिन

माइक का खूँटा समझ लिहिन

मुह का अपने उइ सींग समझ

जनता के कानेम खोंस दिहिन

चिग्घारिन अतनी जोर सुनौ

सब इसपीकर भन्नाय रहे

देखव ! कबिजी अल्लाय* रहे ।

देखव ! कबिजी अल्लाय रहे ।


यक हाहाकारी छन्दु पढ़िन

धरती अकास डोलवाय दिहिन

दुसरे कबिता कै बम दागिन

कुल पाकिस्तान मिटाय दिहिन

जस जस उइ कबिता पढ़त जाँय

तस तस सरीर टन्नाय* रहे

देखव ! कबिजी अल्लाय* रहे ।

देखव ! कबिजी अल्लाय रहे ।


पाकिस्तनवा का फूँकि तापि

गांधिक चौगिरदा घेरि लिहिन

दुइ चार पड़क्का दागि दूगि

फिर जुरतय खींस निपोर दिहिन

सुनिकै उनकी कबिता बानी

सब सुनवइया बिल्लाय* रहे

तबहूँ कबिजी अल्लाय* रहे ।

देखव ! कबिजी अल्लाय रहे ।


उइ मंच-अखाड़ा पर ककुआ!

दहिने कूदँय बायें दौरँय 

कबहूँ फुफकारँय सांप मेर

कटहा कूकुर खस भौंकि परँय 

नउटंकी के खेलवइया खस

उइ चौंसठ कला देखाय रहे

देखव ! कबिजी अल्लाय* रहे ।

देखव ! कबिजी अल्लाय रहे ।

        

(अल्लाय रहे-भोंपू जैसे चिल्लाना, टन्नाय रहे- तनना/उत्साहित होना, बिल्लाय रहे - बोर हो रहे)


3. 

दोहा 

नेता सब कोल्हू बने अफसर अँडुआ बैल ।

पेरा जाय किसान कय हाँड़ फसल खपरैल ।।


कम्पनियन का छूट है रक्खँय दाम करेर ।

पै किसान की उपज कय दाम तय करँय गैर ।।


कम्युनिष्ट भोंपू भये संघी तुरही ढोल ।

ई हल्ला मा को सुनै निरहू घुरहुक बोल ।।


जनवादी कबिजी भये बड़का लम्बरदार ।

अइसी भासम लिखत हैं आवै पढ़े बुखार ।।


गारी-गुप्तारी भरी जिनके कबितम खूब ।

प्रगतिसील के नाम से वै सब भे मन्सूब ।।


हिन्दू मुस्लिम बीच मा खेल अनोखा भाय ।

जब यकजन गुस्साय गा दूजा दिहिस चिढ़ाय ।।


दिल्ली मा मसहूर हैं गाँव न चीन्हय कोय ।

असली जनवादी कबिक यही कसउटी होय ।।

      

     

4.

दिगपाल छन्द मा


अब वक्त आइगा है अब खुल के कहा जाई 

मन कै हरेक पीरा अवधी मा लिखा जाई 


हर ऊ कि जे सताई मजदूर गरीबन का

कबिता से उका जुरतय ललकार दिहा जाई


अइहैं जो अबकी नेता वोटवा लियय दुआरे

पल्ला सड़ाक देनी ओडगाय दिया जाई 


परधान लोग आँड़ेम बोलिन हैं बीडिओ से

गल्ला जो सरि गवा है बँटवाय लिया जाई 


घर दूर है त का भा हिम्मत कै छतुरिया है

जब घाम बहुत लागी सोंहताय लिया जाई


हमसे लियत हैं तीसम बेचँय पचास रुपयम

गायिन क दूध डेरिन का अब न दिहा जाई 


उतरव जमीन पर औ सींचव रकत से धरती

कबितन की डुगडुगी का अब नाय सुना जाई 

         

5.

दिगपाल छन्द


जब जिव न लागी दुनियम तब काह करा जाई

कनखिन के इसारन का कबितन मा लिखा जाई


लय दय के अपने लग्गे दउलत यहय है अतनी

वहिका सबेरे सन्झा दस बार गिना जाई


मोटा महीन जो है बहुतय खुसी हमँय है

अब हाथ कोइक समुहें कब्बौ न धरा जाई


उइ हमका अब न देहँय यक्कव गिलास, तौ का 

सुधियन कै सहद मन के मेटुका मा भरा जाई


दुनिया के बात कहिकै जब जिव कचाई आपन

दुइ चार छन्द तुलसी कय बांच लिया जाई


अइहैं जो ग्यान बाँचय उद्धव सहर से तौ फिर

गोपिन की तरह कर्रे से झार दिया जाई


हाथेम भरा है जांगर मन हौसिलस भरा है

पुरिखन के नाम रोसन कइ के ही मरा जाई


घूमित है फटहा बनिकय तौ कम हमय ना जानेव

यहि जुग कै नाम हमरे नामय पै धरा जाई 

             

6. 

अइसा हिरन बनेव की बघवक फँसाय बइठेव


अब का कही कि जिनगिम तू का कराय बइठेव

अइसा हिरन बनेव की बघवक फँसाय बइठेव


आंसू का हमरे पोछेव है ठीक बात लेकिन

चुप्पय से एकु कांटा दिल मा अँड़ाय बइठेव


सोचेन रहा गयेव तू   फिर लौटि परेव बपई

घामे से जव बचेन तव चहलम धँसाय बइठेव


ई तव बड़ा गजब है आवय न कुछ समझ है

जे प्यार किहिस तोहका वहिपय रखाय बइठेव


अँगरेज मेर बोली मुलतान खस पजामा

ई कउन भेसभूसा घरमा बनाय बइठेव


माटिक रहीं देवालँय तौ छत पै रहा खपरा

ईंटन की देवालन पर टीना छवाय बइठेव


माना कि दूध मा है चीनी बहुत जरूरी

गबड़ेव मुला तू अतना  दुधवय गँवाय बइठेव


हिन्दी के छन्द पर है तुँहका भरम गजल कय

पुरिखा सरग मा रोइहँय तू सब भुलाय बइठेव

            

7. 

उइ हम पर खउख्याय परे !


हम तौ अतनय कहेन रहय की नेतवय सब बिलुवाय चले।

उइ हम पर खउख्याय परे !


हम का जानी उनके खत्तिर नेता जी भगवान अहीं

उनके मन मा पार्टिक झण्डा, तिनरंगा लहरात नहीं

हमरी एक बात पर दुइ सौ सब्द-बान बरसाय चले

उइ हम पर खउख्याय परे !


दनदन दनदन सबय योजना उइ हमका गिनवाय दिहिन

चार मिनट मा सगरेव देसवम खुसहाली बरसाय दिहिन

अइसा पच्छ धरिन की सगरेव परवक्ता सरमाय परे

उइ हम पर खउख्याय परे !


अपने सगरिव मित्र हितइसिन का उइ कूड़ा समझ लिहिन

जे तनिकव चूं चां कइ दिहिस लइ लगदा दउराय लिहिन

पांच मिनट मा पांच साल कय यारी उइ भुलवाय चले

उइ हम पर खउख्याय परे !


उनके समुहें अगर कोइ कहि परय कि पेट पिराय रहा

तौ उइ कहिहँय ई ससुरा सरकारेक नाम बिगारि रहा

यहय बात हम कहि बइठेन तौ मुह फुलाय रिसियाय चले

उइ हम पर खउख्याय परे !

      

8.

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय


सांस फूलय करेजवा के हिरना कय ।

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय ।।


छिन छिन घेरय चुरयिलिया बदरिया

बेर बेर छोरय चूनरिया बयरिया

पानी भरय मा पकरि हाथ खँइचय

कुँआ मा झलकि छबि सजना कय 

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय ।।


उइ तौ नखलउवा उठावय गे माटी

मारय पिठासा पय यदिया ई लाठी

रोज रोज भभकय भभकि डेरुवावय

बतिया ओसारे के दियना कय 

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय ।।


हम सब मजूरन पय दुनिया कय सोंटा

लिहे' लिहे' घूमित है डोरी औ लोटा 

कउनव सवनवा मा माटी न भीजय 

हमरे सुखनके अँगना कय 

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय ।।


अमिरवँय सभै हैं दयिव कय दुलरुआ

हमरेप चलावय बिधनवव पहरुआ

बिगारा जने का उकय कि वहू अब

बैरी बना मोरे सपना कय

याद आवय अँधेरिया मा सजना कय ।।

         

* सर्वेश त्रिपाठी