कबहुँ अदरणीय कवि अष्टभुजा शुक्ल केर 'पद-कुपद' पढे रहन। यइ कुपद अस प्रभावित किहिन जस बहुतन का प्रभावित किही हुइ हनि। असर अस भा कि उइ दिलो-दिमाग मा घुसे बैठ रहे। पढ़ी-लिखी दुनिया औ सोध के पेसेवर समाज मा रहत भए, बनावटी समाज का बहुत करीब से देखे क मौका मिला, तौ बात-बात पै वहे कुपद याद रहे। एक दिन संगी-साथिन ते बतियात भए, ई कहानी याद आई कि गदहा के लोनु औ रुई लादे के बीच मा तौ सोध-प्रविधि काम कै रही है। माने गदहा मिजाज मा तौ पुरान रिसरचर निकाला। कुछ सगे संगिन का सुनावै खातिर ई लिख डारेन, सुनाएन तौ मजा आवा। तौ 'सोध पचीसी' मा यहे कथा का प्रतिकात्मक प्रयोग है औ भाषा मा शाब्दिक मुहावरन केरि कहूँ-कहूँ 'पद-कुपद' की छाया हुइ सकत है। यह कबिता हमरी तरफ ते अष्टभुजा सुकुल कै सादर जैसे 'जिमि बालक सुनि तोतरि बाता...' ...(शैलेन्द्र)
यह कबिता 'खरखइंचा' पर अब पढ़ि लेउ...
शोध-पचीसी
होत सबेर दुनिया जागे सांझ भाए जगु स्वावै
कठिन कहानी बीच भंवर मा दुपहर कौन मनावै
सुर्ज रोजु खपड़ी फारति हैं, भूभुरि तरवा फूँके
रामभरोसे का यहु गदहा जियत जिंदगी नीके ।
यहि गदहा का ब्रह्मज्ञान है, यहिकी बुद्धि सयानी
बड़े बड़े वस्ताज भरति हैं यहिके आगे पानी
यहु दुनिया की रीति पुरातन का बड़का पंडित है
प्रोफेसर साहब का लरिका यहिते बेदु पढ़ति है ।
हाट बाजार मथे घुमति है, यहि की चतुर कहानी
अद्भुत प्रेम प्रपंची लेकिन ज्ञानी
परम जवानी
परम नीति के अनुसासन का यहु है गौरव गाथा
यहि के आगे सदा झुकत है बड़े-बड़ेन का माथा ।
बड़ी विनीत कथा है यहिकी सगरी दुनिया जानै
बात बात पर सबका गदहा बड़े बड़ेन का मानै
होति बिरेचित दृग सूखे घृणा निरापद बांधे
जगतबंधु बेकारी भोगइं दिनु भरि गदहा नाधे ।
खालाऊंची पाँव परे न तुम गदहा ते सीखौ
एक सभ्यता भासा पाइस कबौ खरोष्ठी देखौ
भट्ठा पर ईंटै ढोवत है जाहिते बनी अटारी
जेहि के बल बलवान व्यवस्था सगरी दुनिया मारी ।
ममता मा समता की लोटिया रोजु डुबोवाति गदहा
लोकतन्त्र मा राजतंत्र की हाँक लगावै नतहा
अष्टावक्र गुरू मनात हैं यहि कै गुन पर मोहे
धीरज धनी गुनी अति गदहा क्रोध न कबहुँ सोहे ।
नाटक भरे लतीफा छापे, नुक्कड़ तम्बू ताने
नित नक्कारा बजात यहिके बहर तबील
बखाने
एक कहानी गुरुकुल वाली अवात यादि जबानी
बाई अस खरकत है देखौ यह है चोट पुरानी ।
एक गदहनू विश्व हिन्द मा सोध करै की सोचिन
तगड़ा तर्क ज्ञान की धुन मा फिर फिर सोंचे समुझिन
कठिन जिंदगी हियाँ बड़ी है, लाभवंत हम होई
हमरौ लोहा माने दुनिया नीक प्रबंधन होई ।
शोध प्रविधि की नई किताबे लाय लाय के चाटिन
झउवन झूरी कविता घोटिन, घंटन मन का डाटिन
नैतिक काव्य सिरोही बनि के साही सभा
लगाइन
भरत मुनी से मटुकनाथ तक रटि के कंठ
सुखाइन ।
यूजीसी की दिहिन परिछा केंद्र इलाहाबादी
संगम तट के पंडा वाली बुद्धि मिली बगदादी
गोला रंगिन गोल दुनिया के भये रिसर्चर फेलो
हिंदी की बगिया मा पाइन न्यू एडमीसन तेलू
गदह पचिसी उमर बावरी हुइ गे तीस हजारी
गुरुवा खूसट ओहदा ऊंचा इनकी नियति अनारी
चाटुकारिता नई नवेली बांसन खिचै पानी
उनके भासण इनकी ताली सद्गति होय कहानी ।
पाँच साल मा सौ सौ फंदा गरदन कसे अनारी
कहूँ नौकरी मिल जाई तौ उतरी नाय खुमारी
आँसू आठ खूंट मा बांधे नगर बधू निगरानी
ठाकुर के चरनन लोटति है इनकी भरी
जवानी ।
यह हराम की गोनी लादे परबस कटे उमरिया
मन मारे बरबस चिंता मा भूले नहीं
डगरिया
यहु गदहा अब धोबी क नाहीं है व्यापारी पंडित
रोज लदावै नमक पीठ पर राह नहरिया खंडित ।
नन्दन जी से बनिज कमवै संघ साथ न धावै
नन्दन जी का राह पता है बुद्धि विलासी गावै
नन्दन जी जब बीच धार मा पँहुचइं बोझा लादे
संसद मा अवकास सत्र अस बैठ डुबोवइं गादे ।
हलुक हलुक महसूस होय तौ निर्जन पथ बउरैया
निरत निरंतर शोध हुइ रहा जय हो हिंदी मैया
उपसंघार प्रबंध बखाने कुछ संदर्भित सूची
जगह जगह खौइंचा मारे है सगरी धोती नोची ।
एक दीना कुछ अघटित घटि गा कुंठित मन की मानी
गुरु लदाइस बोझ रुई का जाना बुझा ज्ञानी
मन सोचिन बैसाख नंदने हलुकि बहुत है गोनी
लेकिन तबहूँ बीच धार मा और तनिक कम होनी ।
सुर्ज आजु फिर खपड़ी फारे खाले खौलै पानी
बीच नहरिया गदहू बैठे आँखी ढरकै बानी
उकसि उकसि श्रम सीकर धोवैं परी कुंडली नीके
शोध उपाधि गरू है भइया सी-पों सी-पों डींके ।
-शैलेन्द्र कुमार शुक्ल
वर्धा/ 09/05/2017
