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शनिवार, 17 अप्रैल 2021

शुद्धता, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिक साजिश की शिकार हिंदी  शैलेन्द्र कुमार शुक्ल



शुद्धता, क्षेत्रीयता और सांप्रदायिक साजिश की शिकार हिंदी

 शैलेन्द्र कुमार शुक्ल


साहित्य के मामले में जो प्रगतिशील हैं, वह भाषा के मामले में भी प्रगतिशील और वैज्ञानिक सोच रखते हों यह जरूरी नहीं, वह सामंती, रूढ़िवादी और साम्राज्यवादी हो सकते हैं। हमारा मानना है कि साहित्यिक चिंतक को भाषा के मामले में भी प्रगतिशील और विवेकवान होना चाहिए। भाषा का क्षेत्र आप की बुनियादी जरूरत है। साहित्यिक चिंतक को संवेदनशील होना चाहिए न कि भावुकता के वशीभूत लिजलिजे भावबोध का महारथी। हम यह बात बहुत होशोहवास में कह रहे हैं कि जो साहित्य चिंतन में चालाकी से प्रगतिशीलता का झण्डा गाड़े विद्वता का परचम लहरा रहे हैं, भाषा भविष्य में उनको अवश्य ही नंगा कर देगी और उनकी चालाकी इतिहास में कभी न कभी अवश्य पकड़ी जाएगी। लोकप्रियता के बनावटी प्रतिमान ढह जाएंगे। सदियों पुराने साहित्य के रंगे कागद इसकी गवाही देंगे जैसा कि होता रहा है। चेतना के स्तर पर जहां तक हो सके यथार्थ में विवेक के साथ जीना चाहिए। ‘संग्रह और त्याग बिना पहचाने हमें नहीं करना चाहिए’। यह बात हमारे पुरखों ने भी कुछ सोच कर ही कही होगी।

इधर कुछ सालों से प्रादेशिक भाषाओं के साथ देश की संवैधानिक संपर्क भाषा का रिश्ता भावुकता के राष्ट्रीय संस्करणों ने खराब करने की पुरजोर कोशिश की है। इस पुरजोर कोशिश के पीछे जो हरकत आयी है उसे सच्चे अर्थों में संकुचनशीलता की अति कह सकते हैं। मीर से लेकर खुसरो तक आप देखिये तो हिंदी का एक साहित्यिक स्वभाव आप देख सकते हैं, लेकिन भारतेन्दु से लेकर छायावाद तक या उसके बाद नेहरू सरकार तक उसका भाषिक तौर पर स्वभाव हीनता की तरफ रुख करना भी हमें बहुत कुछ संकेत देता है। अपनी जरूरतों के मुताबिक हिंदी भारत में संपर्क भाषा का काम दर्जा मिलने से बहुत पहले भी करती आ रही थी। यह जरूरत थी देश की। लेकिन तब तक ‘कौन सी हिंदी ?’ का सवाल हमारे सामने सांप्रदायिक ताकत लेकर नहीं आया था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आंदोलनों के चलते जिन नेताओं ने हिंदी की वकालत की उन्होंने ही यह सवाल उठाया ‘कौन सी हिंदी ?’ इस सवाल के पीछे हमारी जो कुंठा, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता से उपजी थी, उसने अपनी साजिशों की जीत का माल बड़ी कुटिलता से अपनाया। हिंदी को राष्ट्र भाषा का वाजिब दर्जा देने की जब बात उठी तो कोई भी असहमत नहीं था, लेकिन जैसे ही यह सवाल सामने आता है ‘कौन सी हिंदी ?’ देश संवैधानिक तौर पर राष्ट्रभाषा की गरिमा से वंचित रह गया। देश की गरिमा के ताबूत में यह कील भी राष्ट्रवादियों की ही ठोकी हुई है।

(21 सितंबर 2020, जनसंदेश टाइम्स)

स्वतन्त्रता आंदोलन के दौर से हमे राष्ट्रीय पहचान के रूप में सामने आने की जरूरत के लिए संपर्क भाषा की जरूरत पड़ी। इस जरूरत ने ही अपनी सुविधानुसार हिंदुस्तानी या हिंदी का दामन थामा। दिल्ली से मेरठ के इर्द-गिर्द बोली जाने वाली भाषा को ही संपर्क भाषा के रूप में नहीं अपना लिया गया, इसमें बहुत बड़ी हिस्सेदारी दक्कनी की भी रही है। दक्कनी ने संपर्क भाषा के तौर पर प्रोगात्मक काम भी किया था। दयानन्द सरस्वती और आर्य समाजियों ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के जरिये उत्तर-पश्चिम से लेकर दक्षिण तक इसी संपर्क भाषा में घूम-घूम कर प्रचार किया था। इसका विकास भारतेन्दु से लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी तक एक मानक स्वरूप में हुआ। इससे खड़ी-बोली का अब कोई मतलब नहीं था, यह हिंदी थी। हालांकि भारतेन्दु युग से द्विवेदी युग तक राष्ट्रवादियों ने जो चाल चली वह सांप्रदायिक और निर्मम थी। इसका उद्भव और विकास जहां से हुआ उसे इन्हीं खुरचालियों ने उर्दू नाम दे दिया और हिंदी अपने लिए सुरक्षित कर ली। आलोक राय ने अपनी किताब ‘हिंदी नेशनलिस्म’ में इसे प्रमुखता से बताया गया है। मीर ने अपनी भाषा को हिंदी कहा, इकबाल ने अपनी भाषा हिंदी बतायी। लेकिन बाद के लोगों ने यह बताया कि ये उर्दू के कवि हैं और हिंदी तो हिंदुओं की भाषा है। हिंदी-उर्दू विवाद कोई विवाद नहीं, यह केवल धांधली और दलाली भर था। नागरी लिपि के बदौलत यह लड़ाई हिंदुओं ने जीत ली लेकिन भाषा और साहित्य के साथ यह धांधली ही थी। आगे चल कर हिंदी के शुद्धिकरण संस्कार शुरू हुए। शुद्ध हिंदी लिखने पर ज़ोर दिया जाने लगा। यह शुद्ध हिंदी क्या थी, जग-जाहिर है, संस्कृत मिश्रित हिंदी। इसमे से अरबी, फारसी, पुर्तगाली शब्दों के प्रयोग को जारज समझा जाने लगा। और हिंदी एक निराले ढंग पर चल पड़ी। यह रास्ता जिस तरफ जाता है उसी तरफ भाषाएँ चल कर देववाणी हो जाती हैं। हिंदी में आगे चल कर छायावाद आ धमका। यह साहित्य से अधिक भाषा की शुद्धता का आंदोलन था। जहां वह मार्ग ले जाये सो हुआ। हिंदी, खड़ी बोली से लेकर अवधी और ब्रज जैसी तमाम मातृभाषाओं के शब्दों से हिंदी ने कन्नी काटनी शुरू कर दी। इस तरह हिंदी शुद्ध संस्कारित पथ पर देवमार्गी हो गई, अब इसने गँवारूपन अपना धो डाला। आजादी मिलने से पहले यह सब काम हो चुका था और हिंदी राज्याभिषेक के लिए तैयार खड़ी थी। आजादी मिली और राजभाषा का दर्जा भी मिला, राष्ट्रभाषा का नहीं। यह हिंदी, हिंदुस्तानी और उर्दू के विवाद का सबक था, जिसे हमारी गलतियों ने गर्व से स्वीकार किया।

हम इस बात पर ज़ोर देकर कहना चाहते हैं कि हिंदी को संपर्क भाषा ही रहने दो, इसे प्रादेशिक भाषाओं पर मत थोपो। मैं यह बात दावे के साथ कहता हूँ कि हिंदी किसी भी प्रांत की मातृभाषा नहीं है। उसके उद्भव और विकास पर किसी एक राज्य की स्वायत्तता नहीं, वह आप की निगाह में कुछ राज्यों में भले सीमित हो, मैं हिंदी को भारत वर्ष की संपर्क भाषा ही मानता हूँ। आप की जड़ताओं और हठताओं के कारण और शुद्धता की दावेदारियों के कारण भले दक्षिण ने हिंदी को राजभाषा मनाने से इंकार किया हो, लेकिन हिंदी संपर्क भाषा के रूप में वहाँ भी है। उत्तर प्रदेश और बिहार के बेरोजगार मजदूर हजारों-लाखों की संख्या में सुदूर दक्षिण राज्यों में मजदूरी करने जाते हैं, मैं आप से पूछता हूँ वह किस भाषा का इस्तेमाल संपर्क के लिए करते है ? उनकी संपर्क भाषा हिंदी ही होती है, अंग्रेजी कदापि नहीं। लेकिन आप के शुद्धतावादी कारखाने से गढ़ी हुई भाषा वह नहीं बोलते, वह जन संपर्क की भाषा बोलते हैं, उसी में वह जीते जागते हैं वहाँ। उन्हें हिंदुस्तानी और दक्कनी से परहेज नहीं, वह भाषा की तमीज में आप से काबिल हैं, इस बात को गांठ में बांध लीजिये।

हिंदी और राज्यों के संदर्भ में विद्वानों द्वारा हुई एक भयानक गलती जितनी जल्दी हो सके हमें दुरुस्त कर लेनी चाहिए। राष्ट्रीयता को सबसे बड़ा खतरा ‘हिंदी पट्टी’ की अवधारणा से है। यह भयंकर वहम है, यह फर्जी गुमान है। हिंदी की जो चटाई आप संकुचित कर दस राज्यों में बिछाए हुए हैं, आखिर उससे आप क्या प्रमाणित करना चाहते हैं ? भाषाई आधार पर हमारा असली हिंदुस्तान इतना भर है! समय रहते बाज आओ फर्जी राष्ट्रीयता के ठेकेदारों। तुम्हारा मूर्खतापूर्ण संकुचन देश की अंतर्वस्तु और शिल्प को खतरे में डालने वाला लगातार साबित होता जा रहा है। गलती सिर्फ तुम्हारी नहीं, तुम्हारे पुरखों ने जो चालाकी की थी, यह उसी का खामियाजा है। यह बहुत कड़वी सच्चाई है कि यदि ‘हिंदुस्तानी’ भारत की संपर्क भाषा मान ली गई होती तो यह भ्रम इन फर्जी राष्ट्रवादियों को इतना संकुचित न करता। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही आदि अपना स्वतंत्र भाषा का अस्तित्व लिए हिंदुस्तानी में वैसे ही पढ़ाई जातीं जैसे हम विश्वविद्यालयों में हिंदी के पाठ्यक्रम में मराठी, पंजाबी, बंगला, तेलगु, कन्नड, उड़िया आदि के साहित्य को पढ़ते हैं। लेकिन हिंदी को केन्द्रीयता मिलते ही कुछ अलग ही घटित हुआ। क्योंकि यह एक शातिर सांप्रदायिक चालाकी थी, तो इसकी हरकतों ने साम्राज्यवादी रुख अख़्तियार कर लिया। इसने अपनी सहूलियत के हिसाब से कुछ राज्यों की तमाम मातृभाषाओं को लपेट में ले लिया। इन भाषाओं को लपेट में लेते ही हिंदी वालों ने बड़ी निर्ममता से इनकी आधुनिकता पर ताला जड़ दिया। वह आज भी लटकते हुए आप को मिल जाएंगे। हिंदी वाले बड़ी चतुराई से इन जीवंत मातृभाषाओं को बोली बता कर लापरवाही के गुमान में मुसकुराते रहे हैं।

आप ध्यान से देखें और इस सवाल का जवाब दें कि जिन मात्रभाषाओं की छाती पर निर्ममता से चढ़कर शिष्ट सांप्रदायिकता की शुद्धतावादी मूंग आप दल रहे हैं और यदा-कदा किराये की रुवासी का अनुष्ठान कर मातृभाषाओं की मृत्यु पर सुखात्मक दुख बड़ी बेशर्मी से प्रकट करते रहें हैं, मुगौरा खाने को लालायित आप के मुख विवर में एक तीर मैं भी छोड़ना चाहता हूँ, आप उत्तर दें- आप जिन्हें हिंदी की बोलियाँ बता कर आगे बढ़े थे – उनके लिए आप ने क्या किया ? मैथिली में विद्यापति के अलावा आप ने किसे याद किया, ब्रज में सूर और रीतिकालीन कवियों के अलावा आप ने किसको हिंदी में शामिल किया, अवधी में जायसी, तुलसी, रहीम के अलावा हिंदी में आप ने किसे पूछा, मगही, कन्नौजी, राजस्थानी सरीखी तमाम भाषाएँ जिन्हें आप बोली कहते हैं, उनका आधुनिक साहित्य कहाँ गया ? इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा ? इन भाषाओं का विपुल आधुनिक साहित्य यदि प्रकाश में सामने नहीं आया, उसको प्रकाशक नहीं मिले, व्यतिगत तौर पर कभी छपा तो नष्ट हो गया- इस अपराध के सीधे-सीधे जिम्मेदार हिंदी के वही मठाधीश है जो तमाम मातृभाषाओं को हिंदी की बोली बता कर देश में संकुचित भाषायिक साम्राज्यवाद का झण्डा बुलंद करने का खुलेआम दावा करते रहे हैं। वह तमाम मातृभाषाएँ जिनकी घेरा बंदी कर आप ने ‘हिंदी पट्टी’, ‘हिंदी प्रदेश’ और ‘हिंदी जाति’ जैसे संकुचित दायरे में बुद्धि विलास का सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी हुलास के तहत राजनीति की है, वह भारत की राष्ट्रीयता के लिए सबसे बड़ा खतरा है और बाकायदा एक आतंकी साजिश।

आप याद करें जब मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए मैथिलों ने मांग की और सक्रिय आंदोलन हुआ, तब भी हिंदी के साम्राज्यवादी पैरोकारों ने खूब विरोध किया था। वह मैथिली को हिंदी की एक बोली ही मानते थे और चाहते थे कि वह हिंदी के साम्राज्य में खुद को विलीन रखे, इसके बदले में हिंदी उनके सिर्फ एक कवि को हिंदी के साहित्यिक इतिहास में नाम देती रहेगी और इससे ज्यादा की गुंजाइश वहाँ नहीं। मैथिली अष्टम अनुसूची में न शामिल हो इसका खूब पुरजोर विरोध हिंदी वालों ने किया था। प्रख्यात मार्क्सवादी आलोचक और प्रगतिशील साहित्यकार डॉ. रामविलास शर्मा ने उस समय ‘पाटल’ (जनवरी,1954) में एक लेख ‘मैथिली और हिंदी’ नाम से लिखा था। इस लेख का मूल उद्देश्य यही था कि मैथिली कोई भाषा नहीं हिंदी की बोली भर है और इसकी भलाई हिंदी के साम्राज्य में बलिदान हो जाने में ही है। यह डॉ. शर्मा का पूर्वग्रह ही था। तब हिंदी के महाकवि नागार्जुन ने इस लेख का वैज्ञानिक और तार्किक जवाब दिया था। ‘आर्यावर्त’(14 एवं 15 फरवरी 1954) में छपे वह लेख आज फिर से प्रासंगिक हो उठे हैं। हमें इन लेखों को फिर से पढ़ने की जरूरत है। डॉ. रामविलास शर्मा जैसे उद्भट विद्वान ने इन लेखों का कोई उत्तर न देकर अपने पूर्वग्रह को स्वीकार कर लिया था। यह विद्वता की कसौटी है और तार्किकता के पुष्ट प्रतिमान।

इधर कुछ सालों से भोजपुरी को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज हो रही है। भोजपुरिये अपना वाजिब हक मांग रहे हैं, यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। वह अपनी भाषा को लेकर चेतन हुए हैं, यह उनकी ज़िंदादिली है। वह अपनी मातृभाषा को संविधान की अनुसूची में शामिल करवाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। ‘जन भोजपुरी मंच’ इसकी अगुवाई कर रहा है। यह बहुत सुखद चेतना है, इसका आदर होना चाहिए। महापंडित राहुल सांकृत्यायन का सपना जो उन्होंने मात्रभाषाओं के पुनीत उत्थान के लिए देखा था, जिसमे देश का बहुत भारी शैक्षणिक और सांस्कृतिक विकास निहित है, थोड़ा ही सही साकार होता दिख रहा है। ‘मातृभाषाओं का महत्व’ उनके द्वारा लिखा ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। यह तमाम मातृभाषाओं के मौलिक अधिकार के लिए संघर्षरत जन-भाषा के आंदोलन धर्मियों का प्रमाणित ‘मेनिफेस्टो’ है। यह लेख शिवदान सिह चौहान के सम्पादन में जनवरी, 1953 ई. में ‘आलोचना’ पत्रिका के अंक में प्रकाशित हुआ था। इस लेख को हमें फिर से पढ़ना बहुत जरूरी है। मातृभाषाओं का यह आंदोलन हमें तब तक उठाना ही होगा जब तक हिंदी की साम्राज्यवादी साजिश के तहत दबी सभी मातृभाषाएँ अपना वाजिब हक न हासिल कर लें। यह बात हिंदी के राष्ट्रीय हित में है। जब ये सारी मातृभाषाएँ अपने स्वतंत्र अस्तित्व में आएँगी तो हिंदी का व्यापक विस्तार होगा। हिंदी अपना सही दर्जा पा सकेगी। वह पूरे देश की संपर्क-भाषा होगी। भारत अपनी राष्ट्र भाषा पा सकेगा। वह संकुचित और सांप्रदायिक साज़िशों की बेहूदी ‘हिंदी पट्टी’ जैसी लांछना से बाहर निकल सकेगी। हिंदी थोड़ा और मुलायम होगी, हिंदी थोड़ा और सहज होगी। इस तरह शुद्धतावादियों के उत्तर-प्रादेशिक कारखाने हिंदी पर अपना कॉपीराइट का अधिकार खो देंगे और पूरे भारत में हिंदी विराट भाषा बन कर उभरेगी।


इधर पिछले सालों में जो साम्राज्यवादी स्वार्थी हिंदी को संकुचित कर उसे कुछ एक राज्यों के गोल दायरे में खींचने को तुले हुए थे, हालांकि आजकल वे ठंढे बस्ते में हैं। फिर भी संकुचित स्वार्थों की पाक जमीन पर कुंठा का चरस लगाए, जादा-कदा हिलोर मारते रहते हैं, उनसे हमारा विनम्र आग्रह है कि वह अपनी प्रगतिशीलता को ताख पर रख कर अनर्गल हरकतें न करें। अगर वह ऐसा करते हैं तो इन तमाम मातृभाषाओं का साहित्यिक इतिहास उन्हें अपना दुश्मन ही मानेगा और हिंदी में आपका सिद्धान्त बहुत ज्यादा दिन नहीं चल पाएगा। इसलिए होश में आइये साहिब ! यह बेहोशी में दावेदारी ज्यादा नहीं चलने की। मेरा निवेदन यदि बुरा लग रहा हो तो बाबा नागार्जुन जैसे अपने पुरखे की कद्र करो साहिब-

“तथाकथित ‘हिंदी प्रदेश’ की एकमात्र ‘जातीय भाषा’ के आतुर समर्थकों ! सांस्कृतिक और राजनीतिक एकता के जोश में अन्यान्य भाषाओं एवं बोलियों के स्वाभाविक विकास की ओर से बेखबर साथियों ! जन सामान्य की प्राकृत-जीभ पर जटिल-क्लिष्ट हिंदी-उर्दू शब्दावलियों की कीलें ठोकने वाले बुजुर्गों ! आप सभी से हमारा एक निवेदन है-

आप लोग हिंदी प्रचार आंदोलन को शासकीय स्वर्ण-चंगुल से मुक्त कर लीजिये। कोटिपतियों के कृपा-कटाक्ष से छुटकारा पाने में उसकी मदद कीजिये। उसे सहज-स्वथ्य जनवादी तरीके से अपना गौरवपूर्ण आसन हासिल करने दीजिए। भारत की प्रधानतम भाषा के रूप में हिंदी का विकास अवश्यम्भावी है। पड़ोसियों से विचारों के आदान-प्रदान की सुविधा के लिए मनन-चिंतन एवं व्यवहार की सार्वभौम उपयोगिता के लिए हिंदी से बढ़िया भला और कौन सी माध्यम होगी, हम भारतीयों के हित में ? आसान हिंदी इन कानों को खूब रुचती है, आज न सही कल, कल न सही परसों वह जरूर मिथिला और भोजपुरी की जीभ पर सुरुचिपूर्वक थिरकेगी। कोटि-कोटि जीभों वाली हमारी यह धरती दो-दो क्या, दस-दस भाषाएँ सफाई से बोल लेगी...वह दिन दूर नहीं है हुजूर, देख लीजिएगा। लेकिन दुहाई सरकार की ! अभी उतावले मत होइए...मिर्च मत रगड़िए इन मासूमों की जीभ पर !

हम तो ठहरे बेहया, दिमाग दुरुस्त नहीं है ! चलते-चलते आप की खिदमत में प्राचीन अपभ्रंश की चंद सतरें पेश कर रहा हूँ –

बालचंद बिज्जावाइ भासा

दुहु नइ लग्गइ दुज्जण हासा

ओ परमेसर हर सिर सोहइ

ई णिच्चई नागर मन मोहइ ।”


©शैलेन्द्र कुमार शुक्ल

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